पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान समर्थित मिलिशिया के ड्रोन हमले में जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे पर तीन सैनिकों की मौत के बाद अमेरिका ने इराक और सीरिया में ईरान समर्थित ठिकानों पर भीषण हवाई हमले किए। इस बीच सऊदी अरब की भागीदारी और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के भड़काऊ बयानों ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय चिंतित है कि यह टकराव व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में न बदल जाए। जॉर्डन के 'टावर 22' अड्डे पर हुए ड्रोन हमले को 1979 के बाद अमेरिकी सेना पर सबसे घातक हमला माना जा रहा है। जवाब में अमेरिकी वायुसेना ने 85 से अधिक ठिकानों पर बमबारी की, जिसमें इराक के अल-क़ायम और सीरिया के डेर एज़-ज़ोर क्षेत्र शामिल हैं। इराकी सरकार ने इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए कड़ी निंदा की है। वहीं, सऊदी अरब ने भी हूती विद्रोहियों के खिलाफ अभियान तेज कर दिया है, जिससे क्षेत्र में एक साथ कई मोर्चे सक्रिय हो गए हैं। तेल बाजार पर इसका तत्काल असर पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया क्योंकि सप्लाई चेन बाधित होने की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने पुष्टि की कि उसने ईरान द्वारा दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलों को सफलतापूर्वक रोका। दूसरी ओर, ट्रम्प ने कहा कि अगर वे सत्ता में होते तो ईरान को 'ऐसी पिटाई लगाते जो वह कभी नहीं भूलता'। ऐसे बयान तनाव कम करने के कूटनीतिक प्रयासों को कमजोर करते हैं। संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। ईरान ने हमले में सीधी भूमिका से इनकार किया है, लेकिन कहा है कि 'प्रतिरोध मोर्चा' अपनी रक्षा करेगा। इराक में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी पर संसद पहले ही निष्कासन प्रस्ताव पारित कर चुकी है। विश्लेषकों का मानना है कि गलत अनुमान या अनियोजित घटना पूरे क्षेत्र को विनाशकारी युद्ध में झोंक सकती है। निष्कर्षतः, वर्तमान स्थिति अत्यंत नाजुक है। सैन्य कार्रवाईयों का चक्र तोड़ने के लिए तत्काल कूटनीतिक पहल आवश्यक है। क्षेत्रीय शक्तियों और वैश्विक महाशक्तियों को वार्ता की मेज पर आकर सुरक्षा चिंताओं का हल निकालना होगा, अन्यथा पश्चिम एशिया एक और लंबे विनाशकारी संघर्ष की ओर बढ़ सकता है।