असम इन दिनों भीषण बाढ़ की चपेट में है जहां ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों ने विकराल रूप धारण कर लिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार इस मानसूनी त्रासदी में अब तक 75 लोगों की जान जा चुकी है जबकि तीन लाख से अधिक लोग बेघर होकर राहत शिविरों में शरण लेने को मजबूर हैं। शिवसागर जिले के ग्रामीणों ने अपनी आंखों से देखा कि कैसे चंद घंटों में उनके घर-जमीन जलमग्न हो गए और उन्हें जान बचाने के लिए ऊंचे स्थानों की ओर भागना पड़ा। बचाव कार्यों में लगी एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें दिन-रात लगी हुई हैं लेकिन जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि ने राहत कार्यों को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया है। राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण कर स्थिति का जायजा लिया और अधिकारियों को निर्देश दिए कि बचाव और राहत कार्यों में किसी भी तरह की कोताही न बरती जाए। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि राहत सामग्री वितरण, चिकित्सा सुविधाएं और स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति निर्बाध रूप से जारी रहनी चाहिए। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा स्वयं राहत कार्यों की निगरानी कर रहे हैं और केंद्र सरकार से अतिरिक्त सहायता की मांग की है। मौसम विभाग ने आगामी दिनों में और भारी बारिश की चेतावनी जारी की है जिससे स्थिति और बिगड़ने की आशंका है। देश के इतिहास में आई भीषण बाढ़ त्रासदियों पर नजर डालें तो 2013 की उत्तराखंड त्रासदी, 2018 की केरल बाढ़, 1978 की उत्तर प्रदेश-बिहार बाढ़ और 2005 की मुंबई बाढ़ जैसी घटनाएं मानस पटल पर अंकित हैं। असम की वर्तमान स्थिति भी इन त्रासदियों की याद दिला रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, अनियोजित शहरीकरण, वनों की अंधाधुंध कटाई और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा डालने वाले बांधों के निर्माण ने बाढ़ की विभीषिका को कई गुना बढ़ा दिया है। प्रतिवर्ष आने वाली इस आपदा के बावजूद दीर्घकालिक समाधानों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। फिल्म अभिनेत्री आलिया भट्ट ने सोशल मीडिया के माध्यम से असम बाढ़ पीड़ितों के लिए सहायता की अपील करते हुए कहा कि यह वार्षिक संकट हर साल हमें अनपेक्षित रूप से घेर लेता है। उनकी इस पहल के बाद कई सामाजिक संगठन और आम नागरिक आगे आए हैं। राहत कोष में दान के अलावा लोग कपड़े, दवाएं, सूखा राशन और स्वच्छता किट भेज रहे हैं। स्थानीय स्वयंसेवी संगठन गांव-गांव जाकर राहत सामग्री वितरित कर रहे हैं और बीमार लोगों को चिकित्सा सहायता उपलब्ध करा रहे हैं। इस त्रासदी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि केवल तात्कालिक राहत कार्यों से काम नहीं चलेगा। बाढ़ प्रबंधन के लिए समग्र नीति, नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों का वैज्ञानिक प्रबंधन, पूर्व चेतावनी प्रणाली का सुदृढ़ीकरण और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे का निर्माण समय की मांग है। असम के लोगों ने विपरीत परिस्थितियों में अद्भुत जीवटता दिखाई है लेकिन उन्हें स्थायी समाधान की दरकार है। केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर ऐसी कार्ययोजना बनानी होगी जिससे प्रतिवर्ष आने वाली इस विभीषिका से स्थायी निजात मिल सके।