सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश को 'अनभिज्ञ और अस्वीकार्य' करार देते हुए केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। संगठन का दावा है कि शीर्ष अदालत का निर्देश सरकार द्वारा दिए गए आश्वासनों के बिल्कुल विपरीत है, जिससे छात्रों और नागरिक समाज में भारी रोष व्याप्त है। सीजेपी के प्रतिनिधियों ने दो दिनों में दो बार चेतावनी जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि आंदोलनकारियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई की गई तो वे अपना विरोध प्रदर्शन पुनः शुरू करने को बाध्य होंगे। सीजेपी के सौरव दास ने मीडिया को बताया कि सरकार ने उन्हें बातचीत के लिए आमंत्रित किया था और सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाया था, लेकिन छात्रों पर दर्ज एफआईआर वापस लेने के संबंध में कोई लिखित गारंटी अभी तक नहीं दी गई है। इस वादाखिलाफी को संगठन ने 'छात्रों का विच-हंट' (डायन-शिकार) की संज्ञा दी है। दास ने जोर देकर कहा कि जब तक ठोस लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तब तक आंदोलन वापस लेने का कोई सवाल ही नहीं उठता। पिछले 20 जुलाई को हुए पुलिसिया कार्रवाई को लेकर सीजेपी ने संसद में विस्तृत चर्चा की मांग उठाई है। संगठन का तर्क है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर बल प्रयोग लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन है। सीजेपी ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने छात्रों का उत्पीड़न तुरंत बंद नहीं किया तो वे नए सिरे से देशव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे, जिसका दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक होगा। इस पूरे प्रकरण ने सरकार और नागरिक समाज के बीच विश्वास की गहरी खाई को उजागर कर दिया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सरकारी आश्वासनों में विरोधाभास संवैधानिक संकट की ओर इशारा करता है। छात्र संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सीजेपी के रुख का समर्थन करते हुए सरकार से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की है। निष्कर्षतः, यह टकराव केवल कानूनी नहीं बल्कि नैतिक और राजनीतिक भी है। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है: एक ओर अदालत के आदेश का पालन करना और दूसरी ओर अपने वादों पर खरा उतरना। यदि इस गतिरोध का शीघ्र समाधान नहीं निकला तो देश को एक और बड़े जनांदोलन का सामना करना पड़ सकता है, जिसकी आंच संसद तक पहुंच सकती है।