सर्वोच्च न्यायालय के हालिया आदेश के बाद भी छात्र नेताओं के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकियों को वापस न लेने के मुद्दे पर छात्र जनता पार्टी (सीजेपी) ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संगठन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि छात्रों के विरुद्ध जारी 'विच-हंट' (सुनियोजित उत्पीड़न) को तत्काल प्रभाव से नहीं रोका गया तो वे दोबारा व्यापक स्तर पर आंदोलन शुरू करने को बाध्य होंगे। इस संबंध में सीजेपी के राष्ट्रीय संयोजक सौरव दास ने कहा कि सरकार न्यायालय के आदेश को ढाल बनाकर छात्रों की आवाज दबाने का प्रयास कर रही है, जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। विगत दो दिनों में सीजेपी की ओर से लगातार दो बार सरकार को कड़ी चेतावनी जारी की गई है। सौरव दास ने खुलासा किया कि सरकार द्वारा उन्हें बातचीत के लिए आमंत्रित कर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश दिखाया गया, लेकिन छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के संबंध में कोई लिखित आश्वासन या ठोस कार्रवाई अब तक नहीं की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अदालती आदेश का हथियार के रूप में इस्तेमाल कर आंदोलनकारी छात्रों को चुन-चुन कर निशाना बना रही है, जो लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है। 'द हिंदू' और 'एनडीटीवी' की रिपोर्टों के अनुसार, सीजेपी ने सरकार से मांग की है कि वह छात्रों के विरुद्ध दर्ज सभी फर्जी मामलों को अविलंब वापस ले और गिरफ्तार किए गए छात्रों को रिहा करे। संगठन का कहना है कि न्यायालय ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को बरकरार रखा है, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी इसका उल्लंघन करते हुए छात्र नेताओं को प्रताड़ित कर रही है। सीजेपी ने इसे 'छात्रों का उत्पीड़न' करार देते हुए कहा कि यदि सरकार ने अपना रवैया नहीं बदला तो आने वाले दिनों में दिल्ली समेत देशभर के विश्वविद्यालयों में एक नया जनांदोलन खड़ा किया जाएगा। इस पूरे प्रकरण पर कानूनी जानकारों का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की भावना का सम्मान करते हुए सरकार को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, सीजेपी ने सरकार को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि वे अब और आश्वासनों के भरोसे नहीं रहेंगे। संगठन ने अपनी राज्य इकाइयों को आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने का निर्देश दे दिया है। माना जा रहा है कि यदि अगले कुछ दिनों में कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई तो छात्र सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे। निष्कर्षतः, वर्तमान गतिरोध सरकार और छात्र संगठन के बीच विश्वास की कमी को दर्शाता है। न्यायपालिका के आदेश के बावजूद जमीनी स्तर पर राहत न मिलना चिंता का विषय है। लोकतंत्र में संवाद ही एकमात्र रास्ता है, इसलिए सरकार को हठधर्मिता छोड़कर छात्र प्रतिनिधियों से सार्थक वार्ता करनी चाहिए। अन्यथा, एक नए छात्र आंदोलन की आहट न केवल शैक्षणिक माहौल को प्रभावित करेगी, बल्कि देश की छवि पर भी प्रतिकूल असर डालेगी।