अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हालिया मुलाकात ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। ईरान के साथ जारी युद्ध की पृष्ठभूमि में हुई यह बैठक दोनों नेताओं के बीच पहली औपचारिक भेंट थी, लेकिन इसके परिणाम उम्मीद के विपरीत रहे। ट्रम्प ने नेतन्याहू को ईरान संबंधी खुफिया जानकारी साझा करने के मुद्दे पर कड़ी फटकार लगाते हुए सवाल किया कि 'तुमने मुझे सीधे क्यों नहीं बताया?' इस घटनाक्रम ने दोनों सहयोगियों के बीच बढ़ती अविश्वास की खाई को उजागर कर दिया है। बैठक के दौरान ट्रम्प के सहयोगियों ने गहरी चिंता व्यक्त की कि नेतन्याहू की आक्रामक नीतियां अमेरिका को ईरान के साथ व्यापक युद्ध में घसीट सकती हैं, जो 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के लिए विनाशकारी साबित होगा। पोलिटिको की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रम्प के करीबी सलाहकारों को डर है कि इजराइल की सैन्य कार्रवाइयां क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाएंगी और अमेरिकी हितों को सीधे खतरे में डालेंगी। द हिंदू ने इस मुलाकात को 'दो मोर्चों की चुनौती' बताया, जहां ट्रम्प को एक साथ यूक्रेन के जेलेंस्की और इजराइल के नेतन्याहू की मांगों को संतुलित करना पड़ रहा है। घरेलू मोर्चे पर नेतन्याहू की स्थिति लगातार कमजोर हो रही है। अल जजीरा के विश्लेषण के अनुसार, इजराइल में भ्रष्टाचार के मुकदमों, न्यायिक सुधारों पर जनाक्रोश और युद्ध प्रबंधन पर सवालों ने नेतन्याहू की राजनीतिक पूंजी को काफी घटा दिया है। उनका 'ट्रम्प कार्ड' - यानी अमेरिकी प्रशासन से विशेष संबंधों का लाभ - अब उतना प्रभावी नहीं रहा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे 1914 जैसी स्थिति करार दिया, जहां क्षेत्रीय संघर्ष वैश्विक युद्ध में बदलने का खतरा मंडरा रहा है। भारतीय मीडिया ने भी इस घटनाक्रम को प्रमुखता से कवर किया है। इंडियन एक्सप्रेस ने खुलासा किया कि ट्रम्प ने नेतन्याहू की उस योजना को खारिज कर दिया जिसमें ईरान परमाणु कार्यक्रम की जानकारी सीधे ट्रम्प को देने के बजाय अन्य चैनलों से साझा करने का प्रस्ताव था। इस प्रकरण ने खुफिया सहयोग की पारंपरिक विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दरार आने वाले दिनों में मध्य पूर्व की भू-राजनीति को नया आकार दे सकती है। निष्कर्षतः, ट्रम्प-नेतन्याहू संबंधों में आई यह खटास केवल द्विपक्षीय मसला नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे पर पड़ेगा। अमेरिका की 'पहले अमेरिका' नीति और इजराइल की अस्तित्व रक्षा की अनिवार्यता के बीच टकराव बढ़ रहा है। भविष्य में इस बात पर बहुत कुछ निर्भर करेगा कि क्या दोनों नेता अपने मतभेदों को भुलाकर साझा रणनीति बना पाते हैं या यह दरार और चौड़ी होकर क्षेत्र को नए संकट की ओर धकेलती है।