नागरिक अधिकार संस्था सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) ने केंद्र सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि बिहार और पश्चिम बंगाल में छात्रों तथा प्रदर्शनकारियों पर दर्ज किए गए मुकदमे और एफआईआर तत्काल प्रभाव से वापस नहीं लिए गए तो कल से देशव्यापी स्तर पर विरोध प्रदर्शन फिर से शुरू कर दिए जाएंगे। संस्था की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि सरकार द्वारा पूर्व में दिए गए आश्वासनों का सम्मान न करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और इससे युवाओं में आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। सीजेपी ने इसे संवैधानिक अधिकारों का हनन बताते हुए सरकार के सामने कड़ा अल्टीमेटम रखा है। संगठन के पदाधिकारियों ने विभिन्न मीडिया माध्यमों से बात करते हुए बताया कि बिहार और बंगाल में शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें रख रहे छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां तथा उन पर संगीन धाराओं में मुकदमे दर्ज करना प्रशासन की दमनकारी मानसिकता को दर्शाता है। सीजेपी ने आरोप लगाया कि कई राज्यों में पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग कर असहमति की आवाज को कुचलने का प्रयास किया जा रहा है। संस्था ने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग करते हुए कहा कि चूंकि कानून व्यवस्था राज्यों का विषय है, लेकिन नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना केंद्र का संवैधानिक दायित्व है, इसलिए केंद्र को तुरंत प्रभावी कदम उठाने चाहिए। सीजेपी की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि सरकार उनकी मांगें नहीं मानती है तो उन्हें मजबूरन कानूनी लड़ाई के साथ-साथ सड़क पर उतरकर जनआंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। संस्था ने चेतावनी दी है कि यह आंदोलन केवल दो राज्यों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका विस्तार राष्ट्रीय स्तर पर होगा। उन्होंने कहा कि पूर्व में दिए गए आश्वासनों के बावजूद मुकदमे वापस न लेना सरकार की वादाखिलाफी है, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस चेतावनी के बाद राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है और विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने सीजेपी की इस मांग का समर्थन करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और उस पर मुकदमे लादकर डराने-धमकाने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए घातक है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को टकराव का रास्ता छोड़कर संवाद के जरिए समस्या का समाधान निकालना चाहिए। सीजेपी ने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि वे इस मामले को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी भी कर रहे हैं, ताकि गिरफ्तार किए गए निर्दोष लोगों को न्याय दिलाया जा सके और भविष्य में ऐसी कार्रवाइयों पर रोक लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करवाए जा सकें। कुल मिलाकर, सीजेपी की इस चेतावनी ने केंद्र और राज्य सरकारों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अब देखना यह होगा कि सरकार समय रहते प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेकर टकराव टालती है या फिर देश को एक नए आंदोलन की आग में झोंक देती है। लोकतंत्र में संवाद और सहमति ही सर्वोत्तम मार्ग होता है, ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार जनभावनाओं का सम्मान करते हुए सीजेपी की जायज मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेगी और संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा करेगी।