उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और केवल आंदोलन होने के आधार पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज करना किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह कड़ी टिप्पणी NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं के विरोध में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर 20 जुलाई को हुए पुलिस बल प्रयोग के मामले की सुनवाई के दौरान की। न्यायालय ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ज्यादतियों की जांच के लिए 28 जुलाई की तारीख तय की है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) और (ख) के तहत प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और अपनी बात रखने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। उन्होंने कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई आंदोलन या विरोध प्रदर्शन हो रहा है, पुलिस को बल प्रयोग का अधिकार नहीं मिल जाता। न्यायालय ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति की आवाज को दबाने के लिए बल प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है। यह मामला NEET परीक्षा में कथित धांधली और प्रश्नपत्र लीक के आरोपों को लेकर जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हजारों छात्रों पर दिल्ली पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज से जुड़ा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और वीडियो फुटेज में दिखाया गया था कि पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर बर्बरतापूर्वक बल प्रयोग किया, जिसमें कई छात्र घायल हुए थे। इस घटना का देशभर में व्यापक विरोध हुआ था और कई सामाजिक संगठनों तथा विपक्षी दलों ने पुलिस कार्रवाई की निंदा की थी। न्यायालय ने इस मामले में दिल्ली पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है और पूछा है कि किसके आदेश पर और किन परिस्थितियों में लाठीचार्ज किया गया। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस को भीड़ नियंत्रण के लिए निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन करना अनिवार्य है और किसी भी स्थिति में अत्यधिक बल प्रयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 28 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में पुलिस को अपनी कार्रवाई का औचित्य सिद्ध करना होगा। यह फैसला भारतीय लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस टिप्पणी से पुलिस और प्रशासन को स्पष्ट संदेश जाएगा कि शांतिपूर्ण विरोध को कुचलने के लिए बल प्रयोग संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है। साथ ही यह नागरिक समाज को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करेगा। न्यायालय की इस सक्रियता से उम्मीद बंधती है कि भविष्य में ऐसे मामलों में पुलिस अधिक संयम और कानूनसम्मत तरीके से काम करेगी।