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Breaking News: संसद तक 'कॉकरोच मार्च' पर पुलिसिया बर्बरता: युवाओं पर पैलेट गन, बिजली के झटके और कील लगे डंडों से हमला, 15 एफआईआर दर्ज
🕒 53 minutes ago

देश की राजधानी दिल्ली में नागरिक न्याय और शांति (सीजेपी) के बैनर तले आयोजित 'कॉकरोच मार्च' ने पुलिस की बर्बर कार्रवाई के बाद राष्ट्रीय सुर्खियां बटोर ली हैं। जनरेशन जेड के इन युवा प्रदर्शनकारियों को 'कॉकरोच' की संज्ञा देते हुए कुछ वर्गों ने भले ही उनका मजाक उड़ाया हो, लेकिन संसद भवन की ओर कूच कर रहे इन युवाओं पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई ने मानवाधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुवार को हुए इस प्रदर्शन में लगभग दस हजार युवाओं ने भाग लिया, जबकि पुलिस का दावा है कि मौके पर केवल तीन हजार जवान ही तैनात थे। प्रत्यक्षदर्शियों और घायल प्रदर्शनकारियों की आपबीती रोंगटे खड़े कर देने वाली है। टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पैलेट गन, बिजली के झटके देने वाले उपकरण और कील लगे डंडों (बैटन विद नेल्स) का इस्तेमाल किया। कई युवाओं के शरीर पर गहरे जख्म, जले हुए निशान और पैलेट गन के छर्रे धंसे मिले। एक प्रदर्शनकारी ने बताया, "उन्होंने हमें जानवरों की तरह पीटा, हमारे कपड़े फाड़ दिए, प्राइवेट पार्ट्स पर वार किए। यह लोकतंत्र में विरोध का अधिकार छीनने की कोशिश है।" घायलों में कई छात्र, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं, जिन्हें अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई यहीं नहीं रुकी। प्रदर्शन के बाद पुलिस ने 15 एफआईआर दर्ज कीं और कई प्रदर्शनकारियों पर हत्या के प्रयास (धारा 307) जैसी गंभीर धाराएं लगा दीं। एनडीटीवी की खबर के मुताबिक, सीजेपी प्रोटेस्ट हिंसा मामले में पुलिस ने हत्या के प्रयास का आरोप जोड़ा है, जिसे कानूनी विशेषज्ञ 'अत्यधिक कठोर' और 'विरोध की आवाज दबाने की साजिश' बता रहे हैं। पुलिस का तर्क है कि प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़े और पुलिसकर्मियों पर हमला किया, लेकिन वीडियो साक्ष्य इसके उलट कहानी बयां करते दिख रहे हैं। फाइनेंशियल टाइम्स और द हिंदू जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों ने इस आंदोलन को 'भारत की कॉकरोच जनरेशन जेड का आक्रोश' शीर्षक से कवर किया है। इन रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कैसे ये युवा बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक अन्याय और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण के खिलाफ मुखर हुए हैं। 'कॉकरोच' शब्द का इस्तेमाल दरअसल इन युवाओं की उस जिजीविषा के लिए किया गया है जो तमाम दमन के बावजूद हार मानने को तैयार नहीं। द हिंदू ने लिखा, "वे रेंगकर नहीं भागेंगे, वे खड़े होकर लड़ेंगे।" इस पूरे प्रकरण ने पुलिस सुधारों, विरोध के अधिकार और युवा आक्रोश को समझने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों और मानवाधिकार संगठनों ने स्वतंत्र जांच की मांग की है। वहीं, विपक्षी दलों ने इसे 'अघोषित आपातकाल' करार दिया है। युवाओं का यह प्रतिरोध आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति की दिशा तय कर सकता है, बशर्ते व्यवस्था उनकी आवाज सुनने के बजाय उन्हें कुचलने की कोशिश न करे। इतिहास गवाह है कि जब-जब युवा शक्ति जागी है, सत्ता के समीकरण बदले हैं।

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✍️ By Pradeep Yadav | 25 Jul 2026