राजधानी दिल्ली में सीजेपी मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल का गंभीर आरोप सामने आने के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है। सीआरपीएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि बल इस तरह की रिपोर्टों की सत्यता की पुष्टि कर रहा है और तथ्यों के आधार पर उचित कार्रवाई की जाएगी। यह मामला तब प्रकाश में आया जब एक वरिष्ठ पत्रकार ने दावा किया कि उनके शरीर पर लगभग 30 पैलेट गन के छर्रों के घाव हैं, जिसकी पुष्टि सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सकों ने भी की है। पत्रकार ने बताया कि घटना के बाद जब वे चिकित्सा जांच के लिए गए तो चैटजीपीटी जैसे आधुनिक उपकरणों ने भी उनके घावों को पैलेट गन की चोट बताया, जिसे अस्पताल के डॉक्टरों ने भी सही ठहराया। वहीं, एक प्रदर्शनकारी ने आरोप लगाया कि नीली वर्दी पहने एक सुरक्षा बल के अधिकारी ने सीधे उनके चेहरे पर गोली चलाई, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। इन आरोपों ने दिल्ली पुलिस के उस दावे को भी चुनौती दी है जिसमें कहा गया था कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं किया गया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस पूरे प्रकरण पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए दिल्ली पुलिस के दावे को खारिज किया और कहा कि पैलेट गन का इस्तेमाल निंदनीय है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को उनके पद से हटाया नहीं जा सकता, लेकिन उन्हें किसी अन्य मंत्रालय में स्थानांतरित किया जा सकता है। राहुल गांधी ने सरकार से मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। मानवाधिकार संगठनों और नागरिक समाज ने भी इस घटना पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे नागरिकों पर पैलेट गन जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल संविधान प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन है। विशेषज्ञों का मानना है कि पैलेट गन का इस्तेमाल केवल अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, वह भी अत्यधिक सावधानी के साथ। सीआरपीएफ की जांच पूरी होने तक इस मामले पर राजनीतिक सरगर्मी तेज रहने की संभावना है। विपक्षी दल इसे सरकार की दमनकारी नीति बता रहे हैं, जबकि सरकार का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं। अब सबकी निगाहें सीआरपीएफ की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगा। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार मौलिक है, लेकिन उसकी आड़ में हिंसा फैलाने वालों से सख्ती से निपटना भी पुलिस का कर्तव्य है।