जून के अंत तक भारत ने 1901 से अभिलेखित डेटा के आधार पर अपने पाँचवें सबसे सूखे माह को दर्ज किया, जब वर्षा की मात्रा औसत से 40 प्रतिशत तक कम रह गई। मौसम विज्ञान विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, इस महीने में केवल 46.8 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य वर्ष में इस अवधि में लगभग 115 मिलीमीटर की अपेक्षा की जाती है। पिवित्री, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के कई हिस्सों में वर्षा बिल्कुल नहीं हुई, जिससे कृषि उत्पादन और जल उपलब्धता दोनों पर गहरा असर पड़ा। मानसून की देर से शुरूआत ने किसान समुदाय को गंभीर दुविधा में डाल दिया है। धान, कपास और सोयाबीन की बुवाई का कार्य अब तक रुका हुआ है, क्योंकि कई किसान प्रारंभिक फसलों की पैदावार का अनुमान नहीं लग पा रहा है। फसल कटनी की तैयारी में लगे किसानों को अब अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता पड़ेगी, जिससे जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव रहेगा। इसके अलावा, जलस्वीकृत शहरी क्षेत्रों में जल आपूर्ति कम होने की चेतावनी जारी की गई है, और कई शहरों में पानी की टकरी से उपयोग की प्रतिबंधात्मक नीतियां लागू की जा रही हैं। भारतीय मौसम विभाग ने जुलाई के लिए भी वर्षा में कमी का पूर्वानुमान लगाया है, जिससे इस महीने का औसत वर्षा सामान्य से लगभग 15 प्रतिशत तक कम रहने की संभावना है। इस अवधि में इला निनो की संभावनाओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने 12 प्रभावित राज्य के लिए आपातकालीन योजना तैयार कर ली है, जिसमें जल संरक्षण, वैकल्पिक सिंचाई विधियों और सूखे राहत के उपाय शामिल हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस प्रवृत्ति का परिपथ नहीं बदला गया तो अगली वर्षा अवधि में भी कमी देखी जा सकती है, जो कृषि तथा उद्योग दोनों को संकट में डाल सकती है। इन चुनौतियों के मद्देनज़र, जल प्रबंधन की दिशा में नई नीतियां बनाना अत्यावश्यक हो गया है। जलसंधारण परियोजनाओं को तेज़ी से लागू करने, बरसात के जल को संग्रहित करने और कृषि में कम जल की आवश्यकता वाले फसल प्रकारों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। साथ ही, किसानों को सूखा प्रतिरोधी बीज, आधुनिक सिंचाई तकनीकें और उचित बीमा योजनाओं से युक्त समर्थन देना भी आवश्यक है, जिससे वे इस असामान्य मौसम के प्रतिकूल प्रभावों से बच सकें। संक्षेप में कहा जाए तो भारत ने इस जून में अपने इतिहास में पाँचवाँ सबसे सूखा महीना दर्ज किया है, जिससे कृषि, जल सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर गहरा असर पड़ा है। मौसमी परिवर्तन, इला निनो की संभावनाओं और जल संकट को ध्यान में रखते हुए, सरकार और समाज दोनों को मिलकर एक ठोस और टिकाऊ समाधान की ओर कदम बढ़ाना चाहिए, ताकि भविष्य की असुरक्षित मौसम स्थितियों में राष्ट्रीय स्थिरता और खाद्य सुरक्षा बनी रहे।