नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हफ्ते इरान के राष्ट्रपति इब्राहीम पेझेश्कियन के साथ पश्चिम एशिया की जटिल स्थिति पर विस्तृत बातचीत की। दोनों देशों के नेताओं ने इस मुलाक़ात को क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और आर्थिक सहयोग को सुदृढ़ करने के एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में प्रस्तुत किया। भारत ने इस समय को मध्य पूर्व में चल रहे तनाव को कम करने और जलमार्गों की मुक्त आवाज़ को सुनिश्चित करने का अवसर बताया। इस वार्ता में अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, इज़राइल‑फ़िलिस्तीन समस्या और ईराक के पुनर्निर्माण जैसे मुद्दों को भी व्यापक रूप से चर्चा किया गया। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत का मूल उद्देश्य स्थायी शांति और सभी देशों के बीच द्विपक्षीय लाभ पर आधारित संबंध स्थापित करना है। वार्ता के दौरान भारत ने समुद्री सुरक्षा और खुले जल मार्गों के महत्व पर बल दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "हिंदुस्तान अपने सभी व्यापारिक मार्गों की मुक्त व सुरक्षित आवाज़ को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है, और हम इस दिशा में अंतरराष्ट्रीय नियमों के पूर्ण पालन पर ज़ोर देते हैं"। इरानी राष्ट्रपति ने भारत के इस साहसिक कदम की प्रशंसा की और कहा कि दोनों देशों की सहयोगिता ऊर्जा, बुनियादी ढाँचा और विज्ञान‑प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में नई संभावनाओं को जन्म देगी। दोनों पक्षों ने भविष्य में ऊर्जा साझेदारी, विशेषकर तेल व गैस के निर्यात‑आयात के क्षेत्र में गहरी तालमेल बनाने की इच्छा व्यक्त की। क्षेत्रीय तनाव के मद्देनज़र, दोनों देशों ने संयुक्त रूप से कहा कि कार्यकाल के अंतर्गत शांति प्रक्रिया को तेज़ी से आगे बढ़ाया जाएगा। इरान ने भारत को मध्य पूर्व में चल रही संघर्षों के समाधान में मध्यस्थता के प्रस्ताव पर विचार करने का संकेत दिया, जबकि भारत ने यह स्पष्ट किया कि वह सभी पक्षों को संवाद की राह अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। इसके अलावा, दोनों देशों ने आर्थिक निवेश, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान‑प्रदान को बढ़ावा देने के लिए एक-दूसरे के साथ द्विपक्षीय पहलें शुरू करने की योजना बनाई। प्रधानमंत्री ने इस मुलाक़ात का सारांश देते हुए कहा कि भारत के लिए पश्चिम एशिया की शांति और स्थिरता राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि दोनों का मूलभूत स्तम्भ है। इरान के राष्ट्रपति ने कहा कि इस वार्ता से दोनों देशों के बीच विश्वास की नींव और मजबूत हुई है और भविष्य में अधिक सार्थक सहयोग की आशा है। इस प्रकार, इस संवाद ने न केवल भारतीय-इरानी संबंधों को नई दिशा दी, बल्कि क्षेत्रीय शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को भी स्पष्ट रूप से उद्घाटित किया।