फ़रिडाबाद के एक छोटे व्यापारिक संस्थान के मालिक, ४५ वर्ष के राजेश कुमार (नाम बदल दिया गया) ने २७ जुलाई को अपनी दुकान के पीछे गली में खुद को ठोंक कर मार दिया। घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक लंबा वीडियो सामने आया, जिसमें उसने अपनी पत्नी और सास-ससुर के साथ लगातार उत्पीड़न का आरोप लगाया। अपने अंतिम पदचिह्न में उसने कहा, "मैं झाड़ू लगाता हूँ, पोछा लगाता हूँ, बर्तन धोता हूँ, पर वह मेरी हर बात नहीं मानती, लगातार मुझे मारपीट करती है, और मेरे ससुर मेरे मामलों में दखल देते हैं"। वह वीडियो, जो इंस्टाग्राम पर अपलोड किया गया, लगभग पाँच मिनट लंबा था और उसमें राजेश ने अपने घर के अंदर-बहार के कई घटनाक्रम को बड़े शोकपूर्ण स्वर में बताया। उसने बताया कि वह पहले अपने परिवार में एक अच्छा पति और पिता बनने की कोशिश करता रहा, पर जब उसकी पत्नी ने उसे घर के कामों में बराबर भागीदारी देना शुरू किया, तो वह अपने मनोविज्ञान में बदलाव महसूस करने लगा। बेटी की स्कूल फीस, बैलेंस शीट का ख़त्म होना और सास द्वारा लगातार वित्तीय दबाव डालने को लेकर वह तनाव में था, लेकिन परिवार के भीतर की दुविधा को उजागर करने की हिम्मत नहीं कर पाया। पुलिस ने राजेश के शव को पहचानते ही मामला दर्ज किया और पड़ोसियों से पूछताछ शुरू की। पड़ोसीों के अनुसार, राजेश एक मेहनती और ईमानदार व्यक्ति था, जो सुबह‑शाम दुकान चलाता और शाम को घर की सफ़ाई करता। लेकिन उसके घर में कई महीनों से शारीरिक और मौखिक उत्पीड़न की खबरें चल रही थीं। राजेश की पत्नी, जिसका नाम सुश्री अंजली (नाम बदला गया) बताया गया, और उसके ससुर ने कई बार पुरुष को व्यापार में किसी प्रकार की सहायता न करने के कारण उसे दबाव में रखा। एक तो इस बात की पुष्टि भी की गई कि अंजली ने राजेश को घर के कामों में झुंझलाते हुए कई बार मारपीट और गाली-गलौज की थी। आरोपों के बीच कई विषय सामने आए हैं: महिलाओं के अधिकार, घरेलू हिंसा, और आर्थिक दबाव। सामाजिक संगठनों ने इस घटना को घरेलू अत्याचारों पर गंभीर चर्चा का विषय बनाया है। कई अधिकार केंद्रों ने कहा कि जब तक पीड़ित व्यक्ति अपनी आवाज़ नहीं उठाता, तब तक ऐसे मामलों को सुलझाना मुश्किल है। इस घटना ने फिर एक बार यह सवाल खड़ा किया कि भावी पीड़ितों को उनके अधिकारों के लिए कैसे सशक्त किया जाए, और समाज में घरेलू हिंसा को कम करने के लिए किस प्रकार के नीतियों को लागू किया जाए। निष्कर्षतः, राजेश की दुखद मृत्यु ने यह स्पष्ट किया कि आर्थिक समस्याएँ, पारिवारिक तनाव और घरेलू उत्पीड़न एक साथ मिलकर मनोवैज्ञानिक बोझ उत्पन्न कर सकते हैं, जो किसी भी व्यक्ति को हताशा की कगार पर ले जा सकता है। इस घटना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता; यह आवश्यकता है कि सामाजिक, कानूनी और मानसिक सहायता नेटवर्क को मजबूत किया जाए, ताकि पीड़ितों को समय पर मदद मिल सके और ऐसे दु:खद अंत को रोका जा सके।