जम्मू और कश्मीर के इतिहास में एक दर्दनाक घाव बना रह गया है, जब १९९० में कश्मीरी पंडित नर्स सारला भट्ट की हत्या हुई। इस मामले में कई सालों तक आरोपियों की पहचान अस्पष्ट रही, परन्तु अब अदालत में पेश किए गए चार्जशीट के बाद यासीन मलिक का नाम मुख्य आरोपी के रूप में उभरा है। यासीन मलिक को न केवल सारला भट्ट की हत्या का आरोप है, बल्कि उसे बलात्कार, हत्या और सूचनाकर्ता बताकर बदनाम करने का भी आरोप है। इस प्रकार ३६ वर्षों बाद, एक लंबी और जटिल जांच का परिणाम सामने आया है, जो न्याय के पथ पर एक नया मोड़ लेकर आया है। चार्जशीट में बताया गया है कि यासीन मलिक, जो उस समय जम्मू व कश्मीर लेबर फ्रंट (JKLF) के प्रमुख नेता थे, स्थानीय आतंकवादी समूहों से जुड़कर १९९० में सारला भट्ट को बंधक बनाकर बाद में बुनियादी कारणों से मारवाया गया। पुलिस के अनुसार, हत्या के साथ ही यासीन मलिक ने आगे बढते हुए आकर्षण के रूप में भट्ट के परिवार को डराने के लिये कई हिंसक क़दम उठाए। हत्या के तुरंत बाद, पुलिस ने भट्ट के शव को शहर के एक गुप्त स्थान पर दफनाया, जिससे मामले की जांच को कई दशक तक कठिन बना दिया। मामले की ख़ास बात यह है कि यासीन मलिक को कई बार विभिन्न साक्ष्यों से जोड़ने की कोशिश की गई, परंतु साक्ष्यहीन और राजनीतिक दबाव के कारण उन्हें कभी अदालत में नहीं बुलाया गया। अब २०२४ में, जब इस केस की फिर से जांच शुरू हुई, तो कई गवाहों के बयान, मोबाइल डेटा और डिटेक्टिव रिपोर्ट ने यासीन मलिक को सीधे इस घटना से जोड़ दिया। इस नई सबूत के आधार पर अदालत ने यासीन मलिक के विरुद्ध सशस्त्र संगठनों (SIA) एक्ट के तहत मुकदमा दायर किया है, जिससे यह मामला अदालत में पहुँचने के बाद से ही एक नया मोड़ प्राप्त कर चुका है। न्याय के इस छोटे से कदम ने सर्वानुग्रह सम्मानित सारला भट्ट के परिवार को कुछ राहत दिलाई है, परन्तु कई लोग अभी भी सवाल उठाते हैं कि ३६ साल की लम्बी अवधि में क्यों इतना देर हुई, और क्या राजनीतिक मंशा इस प्रक्रिया को प्रभावित कर रही थी। न्यायपालिका ने कहा है कि इस केस के सभी तथ्य को पूरी तरह से पूछताछ किया जाएगा, और यदि यासीन मलिक को दोषी पाया गया तो कठोर सजा होगी। अंततः, सारला भट्ट की हत्या का मामला अब न्याय के दौर पर आया है, जो न सिर्फ दंगातान के इतिहास को सही दिशा में ले जाने का संदेश देता है, बल्कि न्याय के प्रति लोगों के भरोसे को भी पुनर्स्थापित करता है। यह केस एक चेतावनी है कि किसी भी मानवाधिकार हनन के बाद भी, यदि सच्ची जांच और दृढ़ संकल्प हो तो अंततः न्याय की रोशनी चमकेगी, चाहे वह ३६ साल बाद ही क्यों न आए।