पुणे के नासरापूर गांव में हुई एक भयानक त्रासदी ने पूरे महाराष्ट्र को हिलाकर रख दिया था। तीन साल की नन्ही बच्ची, जिसे केवल अपनी मासूमियत के कारण निशाना बनाया गया, को अपहरण कर बलपूर्वक यौन शोषण किया गया और फिर उसके शरीर को जलाने तक किया गया। इस निर्दयी अपराध के पीछे था 65 वर्ष का कुशल दासु बंधु, जिन्होंने न केवल एक मासूम जीवन को छीन लिया, बल्कि सामाजिक संस्थाओं के विश्वास को भी धूमिल कर दिया। अदालत ने इस घृणास्पद केस में तेज़ और सख्त फैसला सुनाते हुए आरोपी को मौत की सज़ा सुनायी। दो सुनवाई के बाद, पुणे के जलालाबाद सत्र न्यायालय ने 60 दिनों के भीतर फैंसला देने की शर्त रखी और वे इस बात पर भी बल दे रहे हैं कि ऐसे अपराधियों के लिये कोई दया नहीं है। न्यायपालिका ने कहा कि इस तरह के अत्याचार को सहन नहीं किया जा सकता और समाज को ऐसे अपराधियों से बचाने के लिए कड़ी सज़ा अनिवार्य है। संबंधित जांच में यह स्थापित हुआ कि आरोपी ने लड़की को अपने घर में बंद कर रखा, फिर कई दिनों तक उसे यातना दी और अंततः उसे जलाकर जमीन में दफन कर दिया। जाँच के दौरान मिलने वाले साक्ष्य, गवाहों के बयान और वैडिक्ट वीडियो ने यह स्पष्ट किया कि यह एक संगठित और पूर्व नियोजित कृत्य था। इस प्रक्रिया में कई बार पुलिस को सूचना मिलने पर भी उसने कार्रवाई नहीं की, जिससे सामाजिक नीरसता की तीखी आलोचना सामने आई। वैधानिक दृष्टिकोण से, इस फैसले ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 376 (बलात्कार) के तहत दी गयी सजा को कड़ाई से लागू किया है। इसके अलावा, कई उच्च न्यायालयानों ने इसी प्रकार के मामलों में 'समान्य' उपचार को हटाकर सजा को अधिकतम सीमा तक बढ़ाया है। इस मामले में उपर्युक्त धारा के साथ साथ 'संबंधित तनाव' के कारण मृत्यु की सजा को भी प्रवर्तित किया गया। सम्पूर्ण समाज को इस निर्णय से एक स्पष्ट संदेश मिला है कि बच्चे के खिलाफ कोई भी अत्याचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और न्यायिक प्रक्रिया में कोई भी देरी नहीं होगी। राज्य सरकार ने भी इस सजा के बाद पुलिस को कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करने और भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिये विशेष टीम बनाने की घोषणा की है। इस प्रकार, नासरापूर केस ने भारत में बाल सुरक्षा के लिये एक नई दिशा तय की है और भविष्य में ऐसे दु:स्वप्न को रोकने की दिशा में एक ठोस कदम स्थापित किया है।