बीकानेर से पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक सौ अस्सी फीट ऊंचे रेतीले धोरे पर ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बालकनाथ मंदिर स्थित है। पांच सौ वर्षों से भी अधिक पुराना यह प्राचीन मंदिर क्षेत्र के लोगों के लिए अगाध श्रद्धा और आस्था का मुख्य केंद्र रहा है। रेगिस्तानी परिवेश के मध्य स्थित यह पवित्र स्थल अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति और गहरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमियों के कारण पूरे क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।
बालकनाथ मंदिर के उद्गम और इतिहास के पीछे एक बेहद मर्मस्पर्शी और भावुक कहानी जुड़ी है जो हर सुनने वाले की आंखें नम कर देती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में जब क्षेत्र में भीषण सूखा पड़ा था, तब एक विवश मां अपने छोटे बालक को उसी रेतीले धोरे पर यह कहकर छोड़ गई थी कि वह जल्द ही उसके लिए दही-बाटी लेकर लौटगी। यह घटना उस कालखंड की कठिन परिस्थितियों और मानवीय संघर्ष को दर्शाती है।
मां के लौटने की आस में वह अबोध बालक उसी धोरे पर डटा रहा और पूरे बारह साल तक अपनी मां का इंतजार करता रहा। वर्षों बीत जाने के बाद भी उस बालक ने अपने स्थान को नहीं छोड़ा और अंततः उसी धोरे पर अपने प्राण त्याग दिए। इस महान और अद्वितीय प्रतीक्षा तथा त्याग के कारण ही इस संपूर्ण स्थान का नामकरण 'बालकियां धोरा' किया गया, जो आज भी उस बालक की स्मृति को जीवित रखे हुए है।
कालान्तर में इसी पवित्र भूमि पर बालकनाथ मंदिर की स्थापना हुई, जो आज धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन चुका है। एक सौ अस्सी फीट ऊंचे रेतीले धोरे की चोटी पर स्थित होने के कारण यहां पहुंचने का मार्ग कठिन जरूर है, परंतु भक्तों की आस्था इस शारीरिक कठिनाई को सहज ही पार कर लेती है। मंदिर परिसर का शांत और एकाग्र वातावरण आगंतुकों को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करता है।
वर्तमान समय में इस ऐतिहासिक मंदिर की सेवा और रखरखाव का दायित्व संत संतोष दास महाराज पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं। संत संतोष दास महाराज के सानिध्य में मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को उचित मार्गदर्शन और आध्यात्मिक संबल प्राप्त होता है। उनकी देखरेख में यहां आने वाले सभी संप्रदायों के लोगों को इस स्थान के इतिहास और संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलता है।
इस मंदिर से जुड़ी परंपराओं का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव बीकानेर के साथ-साथ दूर-दराज के क्षेत्रों तक फैला हुआ है। यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी गहरी आस्था प्रकट करते हुए मंदिर में दही-बाटी का पारंपरिक भोग अर्पित करते हैं। ऐसी दृढ़ मान्यता है कि जो भी माता-पिता संतान प्राप्ति की मनोकामना या संतान के कल्याण की कामना लेकर इस पवित्र स्थल पर आते हैं, उनकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।
आगामी समय में मंदिर प्रबंधन और स्थानीय समुदाय इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां इस महान त्याग की कहानी से प्रेरणा ले सकें। बीकानेर क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन के विकास के साथ-साथ बालककियां धोरे की इस पावन गाथा को व्यापक स्तर पर प्रसारित करने की योजनाएं भी बनाई जा रही हैं। बालकनाथ मंदिर का यह प्रांगण हमेशा से सत्य, निष्ठा और अटूट विश्वास का अमर प्रतीक बना रहेगा।