सीकर/कोटपूतली: राजस्थान के कृषि परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव लाते हुए, सीकर जिले के लामिया गांव के एक प्रगतिशील किसान सोनाराम ने पारंपरिक खेती को एक बेहद लाभकारी व्यावसायिक उद्यम में बदल दिया है। पारंपरिक फसल चक्र से हटकर और आधुनिक कृषि बुनियादी ढांचे को अपनाकर, सोनाराम ने एक स्थायी खेती का मॉडल स्थापित किया है जो 20 से 25 लाख रुपये से अधिक की वार्षिक आय प्रदान कर रहा है। उनकी यह शानदार सफलता राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में आधुनिक कृषि पद्धतियों की अपार क्षमता को रेखांकित करती है, जो राज्य भर के हजारों किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी है।
ऐतिहासिक रूप से, राजस्थान की कृषि अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से सीकर और पड़ोसी कोटपूतली-बहरोड़ जैसे जिलों में, मुख्य रूप से गेहूं, जौ, चना और सरसों जैसी पारंपरिक और मौसम-निर्भर फसलों पर निर्भर रही है। ये पारंपरिक फसलें अक्सर कम मुनाफा देती हैं और किसानों को मानसून की अनिश्चितता तथा गिरते भूजल स्तर के जोखिमों में डालती हैं। पिछले कुछ वर्षों में, बढ़ती लागत और फसलों के स्थिर बाजार मूल्यों ने कई छोटे किसानों को वैकल्पिक आजीविका तलाशने पर मजबूर किया है, जिससे उच्च-मूल्य वाली और जलवायु-अनुकूल कृषि की ओर बढ़ने की तत्काल आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
आधुनिक खेती की ओर सोनाराम का यह कदम पॉलीहाउस खेती, ड्रिप सिंचाई और सौर ऊर्जा प्रणालियों सहित उन्नत तकनीकों के रणनीतिक उपयोग पर आधारित है। पॉलीहाउस के निर्माण से नियंत्रित वातावरण में फसलों का उत्पादन संभव हुआ है, जिससे वे बेमौसम की उच्च-मूल्य वाली फसलें उगा पाते हैं जिन्हें शहरी बाजारों में अच्छे दाम मिलते हैं। इसके अलावा, ड्रिप सिंचाई प्रणाली ने पानी की खपत को काफी कम कर दिया है और सीधे पौधों की जड़ों तक पानी पहुंचाना सुनिश्चित किया है, जबकि सोलर सिस्टम की स्थापना से बिजली की अनियमित आपूर्ति की समस्या का समाधान हुआ है, जिससे परिचालन लागत में भारी कमी आई है और सालाना 20 से 25 लाख रुपये की शुद्ध आय सुनिश्चित हुई है।
अपनी इस यात्रा के बारे में बात करते हुए, सोनाराम इस बात पर जोर देते हैं कि आधुनिक तकनीक में शुरुआती निवेश दीर्घकालिक वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। लामिया गांव के स्थानीय कृषि विशेषज्ञों और साथी किसानों ने उनके इस व्यवस्थित दृष्टिकोण की सराहना की है। उनका कहना है कि सोनाराम की सफलता ने इस धारणा को पूरी तरह से खारिज कर दिया है कि राजस्थान में खेती घाटे का सौदा है। उनके पड़ोसियों और स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि सोनाराम का खेत अब एक व्यावहारिक प्रशिक्षण केंद्र बन गया है, जहां आसपास के जिलों के किसान पॉलीहाउस प्रबंधन और जल संरक्षण सीखने आ रहे हैं।
सोनाराम की इस सफलता का असर पड़ोसी कोटपूतली-बहरोड़ जिले में भी साफ देखा जा रहा है, जहां के किसान भी इसी तरह की कृषि-जलवायु चुनौतियों का सामना करते हैं। तकनीक के माध्यम से उच्च आय अर्जित करने के इस प्रदर्शन ने कोटपूतली के स्थानीय किसान समुदायों में भारी उत्सुकता पैदा की है, जो अब इस मॉडल को अपने खेतों में लागू करने की योजना बना रहे हैं। इस बदलाव से स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने, युवाओं में कृषि-उद्यमिता को बढ़ावा मिलने और शहरों की ओर होने वाले पलायन में कमी आने की उम्मीद है, क्योंकि अब खेती एक आकर्षक करियर विकल्प के रूप में उभर रही है।
ऐसे व्यक्तिगत प्रयासों के क्रांतिकारी प्रभाव को देखते हुए, कृषि विभाग के अधिकारियों ने विभिन्न राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओं के माध्यम से तकनीक-आधारित खेती को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। सरकार पॉलीहाउस के निर्माण, ड्रिप सिंचाई प्रणाली की स्थापना और सोलर पंप लगाने के लिए भारी सब्सिडी प्रदान कर रही है। प्रशासनिक अधिकारियों ने किसानों से इन वित्तीय प्रोत्साहनों का लाभ उठाने की अपील की है ताकि शुरुआती स्थापना लागत को कम किया जा सके और क्षेत्र में टिकाऊ तथा अत्यधिक मुनाफे वाली कृषि पद्धतियों को तेजी से अपनाया जा सके।
भविष्य की बात करें तो, पारंपरिक खेती से व्यावसायिक कृषि-व्यवसाय की ओर बढ़ने का यह सिलसिला आने वाले समय में और तेज होने की उम्मीद है, क्योंकि अधिक से अधिक किसान तकनीकी हस्तक्षेप के प्रत्यक्ष वित्तीय लाभों को देख रहे हैं। बेहतर बाजार संपर्कों और कोल्ड स्टोरेज जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास के साथ, क्षेत्रीय कृषि क्षेत्र एक बड़ी क्रांति के मुहाने पर खड़ा है। सोनाराम जैसे अग्रदूतों की सफलता यह स्पष्ट करती है कि राजस्थान में कृषि का भविष्य नवाचार, संसाधन संरक्षण और उद्यमशीलता के दृढ़ संकल्प में निहित है।