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दिवाली पर पशुधन पूजा और मवेशी देखभाल के दौरान इन आवश्यक सुरक्षा बातों का रखें ध्यान

दिवाली के पश्चात ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और आजीविका के आधार पशुधन के प्रति आभार प्रकट करने के लिए पशुधन पूजा की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। इस पारंपरिक अनुष्ठान के दौरान मवेशियों को ठंड से बचाने, रासायनिक रंगों से सुरक्षित रखने और उनके स्वास्थ्य का

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Kotputli News प्रकाशित: 08 Nov 2026, 01:31 PM
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दिवाली पर पशुधन पूजा और मवेशी देखभाल के दौरान इन आवश्यक सुरक्षा बातों का रखें ध्यान
दिवाली पर पशुधन पूजा और मवेशी देखभाल के दौरान इन आवश्यक सुरक्षा बातों का रखें ध्यान फोटो आभार: News18 Rajasthan State Wire
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दीपावली के पावन पर्व के पश्चात ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन पूजा की प्राचीन परंपरा का अत्यंत उत्साह और श्रद्धा के साथ अनुपालन किया जाता है। कृषि और आजीविका का मुख्य आधार माने जाने वाले गाय, बैल और अन्य मवेशियों के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए यह विशेष अवसर ग्रामीण परिवेश में अत्यधिक महत्व रखता है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि मानव समाज अपनी आजीविका के लिए किस प्रकार पशुओं पर निर्भर रहा है। किसान अपने खेतों को जोतने और घरेलू आर्थिकी को सुदृढ़ करने में योगदान देने वाले इन मवेशियों को नहलाकर, सजाकर और तिलक लगाकर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।

धार्मिक अनुष्ठानों के इस उल्लास के बीच पशुओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, ताकि किसी भी प्रकार की लापरवाही से मवेशियों को शारीरिक कष्ट न पहुंचे। पशुपालकों को पूजा के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि उत्सव के उत्साह में पशुओं की देखभाल में कोई कोताही न बरती जाए।

विशेषज्ञों और अनुभवी पशुपालकों का मानना है कि बदलते मौसम और ठंड के प्रकोप के दौरान पशुओं को बहुत ठंडे पानी से नहलाने से बचना चाहिए। इसके साथ ही, पूजा के समय इस्तेमाल होने वाले रोली और सिंदूर को पशुओं की संवेदनशील आंखों और मुंह के संपर्क में आने से पूरी तरह सुरक्षित रखना चाहिए।

क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर इन परंपराओं का गहरा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि ग्रामीण परिवारों की खुशहाली प्रत्यक्ष रूप से उनके पशुधन की सेहत से जुड़ी होती है। स्वस्थ पशु न केवल कृषि कार्यों को गति देते हैं बल्कि ग्रामीण परिवारों के आर्थिक संबल का भी प्रमुख स्रोत होते हैं।

स्थानीय स्तर पर यह संदेश भी प्रमुखता से दिया जाता है कि पशुओं को जबरदस्ती बांधने या असहज रूप से सजाने जैसी प्रथाओं से परहेज किया जाना चाहिए। उन्हें केवल स्वच्छ, पौष्टिक और साफ-सुथरा भोजन ही खिलाया जाना चाहिए ताकि उनके पाचन तंत्र पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

आगामी समय में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि धार्मिक परंपराओं के निर्वहन के साथ-साथ पशु कल्याण के आधुनिक मानकों को भी अपनाया जाए। जन जागरूकता के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि सांस्कृतिक धरोहर का यह पर्व पशुओं के संरक्षण और उनकी उत्तम देखभाल का एक सशक्त माध्यम बना रहे।

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सत्यापित पत्रकार

कोटपूतली-बहरोड़ जिला संवाददाता एवं संपादकीय डेस्क

तथ्य-जांच सत्यापित

यह समाचार रिपोर्ट कोटपूतली न्यूज़ संपादकीय आचार संहिता के तहत प्रकाशित की गई है। यदि आपको इसमें कोई तथ्यात्मक त्रुटि प्रतीत हो तो सुधार हेतु संपर्क करें।

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