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Breaking News: सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और एआईआईएमएस को दिया चेतावनी: अल्पवयस्क गर्भपात के आदेश में देरी से contempt charge होगा
🕒 1 hour ago

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आज की सुनवाई में केंद्र सरकार और दिल्ली स्थित महान आयुर्विकात्मक संस्थान (AIIMS) को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि उन्होंने माध्यमिक आयु वर्ग की गर्भधारण समाप्ति के आदेश को लागू नहीं किया तो उन्हें contempt of court (अधिकरण उल्लंघन) के दण्ड का सामना करना पड़ेगा। यह निर्णय उस बालिका के मामले पर आया है, जिसे पेशाब के दौरान बार-बार रक्तस्राव की समस्या थी और उसके डॉक्टर्स ने मान्यतानुसार गर्भपात की सलाह दे दी थी, परन्तु सरकार के आधिकारी अधिकारी ओवरराइड करके प्रक्रिया को रोकने की कोशिश कर रहे थे। सुनवाई में तनावपूर्ण माहौल था। वकीलों और सामाजिक संगठनों ने दलील दी कि बालकियों के स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए और गर्भपात का निर्णय व्यक्तिगत स्वायत्तता और मौलिक अधिकारों के दायरे में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने पुश्तैनी रूप से न्यायिक सिद्धान्त को दोहराते हुए कहा, "जब तक कोई साक्ष्य यह प्रमाणित नहीं करता कि गर्भपात महिला के जीवन को खतरे में डालता है, तब तक गर्भपात की अनुमति देना राज्य की जिम्मेदारी है।" अन्य महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार थे: 1. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि केंद्र सरकार या AIIMS ने अदालत के आदेश का उल्लंघन किया तो contempt‑charge लागू किया जाएगा, जिससे अधिकारी कारावास या जुर्माना भी भुगत सकते हैं। 2. कोर्ट ने यह भी कहा कि गर्भपात की वैधता को परिभाषित करने वाले मौजूदा कानून में सुधार की आवश्यकता है, जिसमें यौन उत्पीड़न के शिकार महिलाओं को 20 हफ्ते से अधिक समय तक का अधिकार नहीं दिया गया था। 3. कोर्ट ने सरकार को सलाह दी कि गर्भपात के मामलों में महिलाओं के मनोवैज्ञानिक और शारीरिक स्वास्थ्य को देखते हुए समयसीमा को लचीला बनाया जाए, विशेषकर जब मामला बालिकाओं या यौन हिंसा के शिकारों से संबंधित हो। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने विभिन्न समुदायों में गहरी चर्चा को जन्म दिया है। महिलाओं के अधिकार संगठनों ने इसे महिलाओं की स्वायत्तता के लिए एक बड़ी जीत कहा, जबकि कुछ रूढ़िवादी समूहों ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि यह सामाजिक मूल्यों को कमजोर कर सकता है। परन्तु अदालत ने दृढ़ता से यह स्पष्ट किया कि न्याय का मुख्य सिद्धान्त मानव अधिकारों की रक्षा करना है, और किसी भी तरह का सरकारी दखल या देरी उन अधिकारों के उल्लंघन के बराबर है। निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि बालिकाओं की गर्भधारण समाप्ति के मामलों में सरकार को अदालत के आदेशों का सम्मान करना अनिवार्य है। यदि केंद्र या AIIMS इस दिशा-निर्देश को अवहेलना करते हैं तो उन्हें सख्त कानूनी परिणाम भुगतने पड़ेंगे। यह कदम न केवल न्यायिक प्रक्रिया की अधिकारिता को सुदृढ़ करता है, बल्कि महिलाओं को उनकी शीघ्र और सुरक्षित स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भी बनता है।

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✍️ By Pradeep Yadav | 30 Apr 2026