सुप्रीम कोर्ट ने हाल के दो प्रमुख मामलों में यह स्पष्ट किया कि अनुराग ठाकुर और पारवेश वर्मा के संसद तथा अन्य सार्वजनिक मंचों पर दिए गए भाषणों में हेट स्पीच की कोई आपराधिक प्रवृति नहीं पाई गई। इस निर्णय ने राष्ट्रीय स्तर पर हेट स्पीच की परिभाषा और उसके कानूनी दायरे को लेकर कई प्रश्न उठाए हैं। कोर्ट ने सबसे पहले यह स्थापित किया कि संसद सदस्यों के द्वारा किए गए भाषणों की विशेष स्वीकृति (parliamentary privilege) होती है, जिससे उन्हें सामान्य आपराधिक प्रक्रिया से कुछ हद तक मुक्त माना जाता है। इस विशेषाधिकार के अन्तर्गत, यदि किसी सांसद द्वारा कही गई बात को तत्क्षण हेट स्पीच के रूप में दर्ज किया जाता, तो उसे अनुचित माना जाता। परन्तु कोर्ट ने यह कहा कि इस विशेषाधिकार को दूरदर्शी रूप में प्रयोग करने से मौलिक अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। इसलिए, अनुराग ठाकुर और पारवेश वर्मा के मामलों में, उनके बयानों को सतही तौर पर देख कर ही हेट स्पीच का आरोप नहीं लगाया जा सकता। उसी समय कोर्ट ने कहा कि भारत में हेट स्पीच को लेकर कोई वैधानिक खालीपन नहीं है। मौजूदा आपराधिक संहिता, सूचना एवं प्रसारण अधिनियम, और विविध अन्य कानूनों में हेट स्पीच के लिए स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। इस कारण से "हेट स्पीच को लेकर विधायी शून्यता" के दावे को खारिज किया गया। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि यदि किसी वक्ता ने सामाजिक, धार्मिक या सांस्कृतिक आधार पर समूह भेदभाव फैलाए तो यह विधायी प्रावधानों के तहत दंडनीय है। न्यायालय ने यह भी बताया कि हेट स्पीच अक्सर "हम बनाम वे" की मानसिकता से उत्पन्न होती है, जहाँ वक्ता किसी विशेष समूह को लक्ष्य बनाकर उनके खिलाफ नफरत को बढ़ावा देता है। इस विचारधारा का विरोध करते हुए कोर्ट ने सभी विधायकों से अनुरोध किया कि वे इस तरह के मामलों में शीघ्र कार्रवाई करें और विधायकों की जिम्मेदारी बनती है कि वे ऐसे भाषणों को नियंत्रित करने के लिए विधायी उपायों को तेज़ी से लागू करें। कोर्ट के इस आदेश में यह स्पष्ट किया गया कि अगर कोई राजनेता या सार्वजनिक व्यक्ति हेट स्पीच करता है तो वह न केवल सामाजिक दायरों में बल्कि कानूनी तौर पर भी दण्डनीय हो सकता है। अंत में यह कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला हेट स्पीच के मुद्दे को स्पष्ट दिशा‑निर्देश प्रदान करता है। जबकि संसद सदस्यों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं, उनका दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। साथ ही, मौजूदा कानूनों में हेट स्पीच को दंडनीय बनाने के लिए पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं, और आवश्यक होने पर विधायी सुधार की भी संभावना बनी रहती है। इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि लोकतांत्रिक बहस में भाषण की स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक सामंजस्य को भी संजोना अनिवार्य है, और इसके लिए न्यायिक संस्थानों का सक्रिय दृष्टिकोण आवश्यक है।