वर्तमान में भारत में द्वेषभाषण को नियंत्रित करने के लिए कई विधायी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन इस मुद्दे को लेकर अक्सर यह सवाल उठता रहता है कि क्या नए कानूनों की आवश्यकता है। इस पर उच्चतम न्यायालय ने अपने हालिया न्यायिक निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी प्रकार का वैधानिक अंतराल नहीं है और मौजूदा कानूनों का उचित कार्यान्वयन ही पर्याप्त उपाय है। न्यायालय ने कहा कि संसद ने आपराधिक दंड संहिता, सूचना अधिनियम तथा कई अन्य विधायिकाओं के माध्यम से द्वेषभाषण के विरुद्ध कड़ी सज़ा तय कर रखी है, और इनका प्रभावी उपयोग किया जाए तो यह समस्या हल हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट की इस बात को कई प्रमुख समाचार एजेंसियों ने व्यापक रूप से कवर किया है। "Live Law" के अनुसार, न्यायालय ने कहा कि यदि भाषा या विचारों का प्रयोग सामाजिक समरसता को बाधित करता है तो उसे रोकने के लिए मौजूदा विधियों में ही पर्याप्त शक्ति है। "The Times of India" ने भी इस निर्णय को उद्धृत करते हुए कहा कि "कानून में कोई वैक्यूम नहीं है" और यह कहा कि नई धारा जोड़ने से केवल प्रक्रिया में देरी होगी, जबकि मौजूदा प्रावधानों पर कड़ा कार्यवाही ही वास्तविक समाधान हो सकता है। ज्यादा स्पष्ट रूप से, न्यायालय ने कहा कि दुशभाषण के मामलों में न्यायिक अधिकरण को पहले से ही विभिन्न प्रावधानों के तहत फाइल दर्ज करने, साक्ष्य इकट्ठा करने और सजा देने का अधिकार है। विशेषकर धारा 153ए, 295ए आदि का प्रयोग करके आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही, सूचना अधिनियम के अंतर्गत इंटरनेट सेवाप्रदाताओं को भी सामग्री हटाने का आदेश दिया जा सकता है। इस प्रकार, मौजूदा कानूनी ढाँचा ही इस सामाजिक समस्या से निपटने में सक्षम है, यह बात कई समाचार लेखों में दोहराई गई है। अंत में, न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि नया कानून बनाकर समस्या का समाधान नहीं हो सकता, जब तक कि वर्तमान नियमों का कुशलता से पालन नहीं किया जाता। इस दिशा में सरकार और राज्य स्तर पर उचित कार्रवाई करने की आवश्यकता है, ताकि द्वेषभाषण के मामलों में शीघ्र और सटीक निर्णय हो सके। यह निष्कर्ष न केवल न्यायिक अधिकारियों के लिये बल्कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के लिये भी मार्गदर्शक सिद्ध होगा, क्योंकि यह दर्शाता है कि न्यायपालिका मौजुदा कानूनी साधनों पर भरोसा रखती है और उनका सही उपयोग ही कई सामाजिक चुनौतियों का समाधान है।