महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रपती सरनाइक ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण घोषणा की, जिसमें उन्होंने कहा कि टैकसी और ऑटो रिक्षा जैसे कमर्शियल वाहन चालकों को मराठी भाषा में दक्षता प्राप्त करनी होगी, तभी वे अपनी लाइसेंस की वैधता बनाए रख पाएंगे। यह कदम राज्य सरकार की भाषा को प्राथमिकता देने की नीति के अंतर्गत आया है, जिसका उद्देश्य न केवल मराठी को सुनहरा बनाना है, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा और संवाद को भी सुदृढ़ करना है। सरकार ने पहले ही इस दिशा में कई आधिकारिक कदम उठाए हैं। राज्य के राजमार्ग परिवहन कार्यालय (आरटीओ) ने मराठी भाषा प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम तैयार कर के पूरे महाराष्ट्र में लागू कर दिया है। इन कोर्सों में भाषा के मूल सिद्धांत, व्यावसायिक संवाद, आपातकालीन संकेत और यात्री सहायता जैसी आवश्यक चीज़ों को शामिल किया गया है। आरटीओ द्वारा आयोजित वर्कशॉप और ऑनलाइन क्लासेस के माध्यम से अब हजारों टैक्सी और ऑटो चालक इस प्रशिक्षण में भाग ले रहे हैं। प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूरा करने पर उन्हें एक प्रमाणपत्र दिया जाएगा, जिसके आधार पर उनके लाइसेंस में कोई बाधा नहीं आएगी। वहीं, इस निर्णय के विरोध में कई ट्रेड यूनियन और ड्राइवर संघों ने टकराव की आशंका जताई है। उनका कहना है कि अचानक मराठी को अनिवार्य कर देना उनके रोजगार की सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो अन्य भाषाओं में अधिक निपुण हैं। इस कारण राज्य सरकार ने इस मुद्दे को लेकर एक अल्पकालिक विचारशीलता का विकल्प अपनाते हुए, निर्णय को स्थगित कर दिया है और एक व्यापक प्रशिक्षण अभियान शुरू करने का इरादा सूचित किया है। इस दौरान कुछ क्षेत्रों में मराठी भाषा अनिवार्य न होने का कार्यकाल जारी रहेगा, ताकि चालक समय पर इस नई नीति के अनुकूल हो सकें। कुल मिलाकर, मराठी को अनिवार्य करने की यह पहल सामाजिक जुड़ाव और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। अगर सभी चालक इस प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूरा कर लेते हैं, तो न केवल यात्रियों को सुविधा मिलेगी, बल्कि मराठी भाषा को भी नया सम्मान मिलेगा। भविष्य में यह नीति अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकती है, जहाँ भाषा और सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता निरन्तर बढ़ रही है।