📰 Kotputli News
Breaking News: सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया खोटे विवाह पर ‘सेक्स’ के आरोप को, लाइव‑इन रिश्ते का फैसला बदल सकता है
🕒 1 hour ago

वर्तमान में अदालतों में चल रहे कई मामलों ने सामाजिक और कानूनी जटिलताओं को उजागर किया है। विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट में आया एक याचिका जिसने प्रश्न उठाया: "वह शादी से पहले उसके साथ क्यों रह रही थी?" इस प्रश्न के केन्द्र में एक महिला द्वारा अपने साथी के साथ रहने को खोटे विवाह का आभाऊ बनाकर ‘सेक्स’ के आरोप लगाना था। इस संदर्भ में न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि केवल सहवास से रजवती अपराध नहीं बनता, बल्कि यह तय करने के लिए अनिवार्य है कि क्या वह रिश्ता वास्तविक शादी का बादल या नियोजित धोखा है। सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रस्तुत तथ्यों में बताया गया कि दोनों पक्षों ने कई वर्षों तक एक साथ रहने के बाद एक बच्चे को जन्म दिया। फिर भी महिला ने अपने साथी पर बलात्कार का आरोप लगाया, क्योंकि उसने यह दावा किया कि उनका संबंध वैध वैवाहिक बंधन नहीं था। अदालत ने इस बात पर बल दिया कि यदि दो लोग आपसी सहमति से एक साथ रहते हैं तो यह अपराध नहीं बनता, जब तक कि कोई बल या धोखा न हो। कोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि खोटे विवाह या गभीरता से बाध्य्र तालिका जैसे आरोपों को सिद्ध करने हेतु ठोस प्रमाण आवश्यक हैं, न कि केवल सामाजिक राय या व्यक्तिगत असंतोष। विभिन्न समाचार स्रोतों ने इस फैसले को विस्तार से बताया। NDTV ने बताया कि न्यायालय ने कहा कि "यदि दोनों पक्षों में बच्चा हुआ है, तो इससे यह सिद्ध नहीं होता कि संबंध में बल प्रयोग हुआ है"। टाइटल्स के अनुसार, टाइमर के मुताबिक "लाइव‑इन रिलेशनशिप को समाप्त करना आपराधिक नहीं है" और यह भी कहा गया कि "सहमति से किया गया संबंध अपराध नहीं है"। हिंदुस्तान ने इस बात पर प्रकाश डाला कि अदालत ने "सहमति के बिना कोई भी संबंध अपराधी नहीं कहा जा सकता" और यह प्रश्न उठाया कि कब रिश्ता अपराध का रूप लेता है। इन बहुप्रतिपादित बयानों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला द्वारा लगाए गए ‘रैप’ के आरोप को स्वीकार करने से पहले यह निर्धारित करना आवश्यक है कि क्या संबंध में कोई धोखा, जालसाज़ी या आर्थिक लालच था। यदि ऐसा सिद्ध नहीं होता तो न्यायालय का यह मानना है कि ऐसी याचिकाएं निरर्थक रूप से सामाजिक मान्यताओं पर आधारित हैं और इसका कानूनी परिणाम नहीं होना चाहिए। यह फैसला न केवल महिला के अधिकारों की सुरक्षा करता है, बल्कि पुरुषों के प्रति भी समान न्याय सुनिश्चित करता है। निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट का यह नया दिशा-निर्देश दर्शाता है कि भारत में वैवाहिक या सहजीवन संबंधों को कानूनी रूप से परिभाषित करने में अधिक स्पष्टता आ रही है। अनुचित आरोपों को रोकने के लिए प्रमाणिकता पर ज़ोर देते हुए, न्यायालय ने यह कहा कि सहमति आधारित रिश्ते में कोई भी दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जा सकती, जब तक कि स्पष्ट रूप से स्पष्ट अपराध नहीं सिद्ध हो। यह निर्णय आगे चलकर न सिर्फ सामाजिक धारणाओं को बदल देगा, बल्कि लाइव‑इन रिश्तों को एक वैध सामाजिक इकाई के रूप में स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

Stay connected with Kotputli News for latest updates.


📲 Share on WhatsApp
✍️ By Pradeep Yadav | 28 Apr 2026