तमिलनाडु की राजनीति में आज बड़ा मोड़ आया जब मद्रास हाईकोर्ट ने डीएमके नेता और राज्य के मंत्री उदयनिधि स्टालिन को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने यह फैसला तब सुनाया जब तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वकील ने स्पष्ट किया कि पुलिस उदयनिधि को गिरफ्तार नहीं करना चाहती, बल्कि केवल एक मामले में उनसे पूछताछ करना चाहती है। इस आश्वासन के बाद न्यायालय ने उनकी हिरासत को अवैध मानते हुए रिहाई का निर्देश जारी कर दिया। इस घटनाक्रम से राज्य में चल रहे तनावपूर्ण माहौल में कुछ राहत मिली है। उदयनिधि स्टालिन को आज सुबह चेन्नई स्थित उनके आवास से हिरासत में लिया गया था, जिसके बाद डीएमके कार्यकर्ताओं ने पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। चेन्नई, कोयंबटूर, मदुरै और अन्य प्रमुख शहरों में पार्टी समर्थक सड़कों पर उतर आए और गिरफ्तारी को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताते हुए नारेबाजी की। इस बीच, वेल्लोर जिले में एक पूर्व डीएमके मंत्री को भी हिरासत में लिए जाने की खबर आई, जिससे तनाव और बढ़ गया। पुलिस ने एहतियातन सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी थी और कई इलाकों में धारा 144 लागू कर दी गई थी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने दलील दी कि उदयनिधि के खिलाफ दर्ज मामले में केवल पूछताछ की आवश्यकता है, न कि गिरफ्तारी की। उन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि पूछताछ के बाद उन्हें छोड़ दिया जाएगा। इस पर न्यायाधीश ने कहा कि जब सरकार स्वयं गिरफ्तारी नहीं चाहती तो हिरासत में रखना उचित नहीं है। अदालत ने तत्काल रिहाई का आदेश देते हुए पुलिस को निर्देश दिया कि यदि पूछताछ आवश्यक है तो उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए नोटिस जारी किया जाए। इस पूरे प्रकरण पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। अभिनेत्री और भाजपा नेता कंगना रनौत ने पुलिस कार्रवाई का समर्थन करते हुए इसे "अच्छी मिसाल" बताया, वहीं डीएमके ने इसे केंद्र सरकार के इशारे पर की गई बदले की कार्रवाई करार दिया। विपक्षी दलों ने भी गिरफ्तारी की निंदा करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया। उदयनिधि की रिहाई के बाद डीएमके कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाया और इसे न्याय की जीत बताया। इस घटनाक्रम से तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरण बनते दिख रहे हैं। जहां एक ओर अदालत का फैसला कानून के शासन की पुष्टि करता है, वहीं दूसरी ओर यह राजनीतिक टकराव की गंभीरता को भी उजागर करता है। आने वाले दिनों में इस मामले का असर राज्य की राजनीति पर पड़ना तय है, खासकर जब लोकसभा चुनाव नजदीक हैं। सभी दल इस मुद्दे को अपने-अपने तरीके से भुनाने का प्रयास करेंगे।