दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह को महिला पहलवानों द्वारा दायर यौन उत्पीड़न के मामले में बरी कर दिया है। अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट हरजीत सिंह जसपाल की अदालत ने सह-आरोपी विनोद तोमर को भी सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। यह फैसला देश के शीर्ष पहलवानों द्वारा महीनों तक चले ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन के बाद आया है, जिसने खेल जगत और राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया था। अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। यह मामला जनवरी 2023 में तब सुर्खियों में आया जब विनेश फोगाट, बजरंग पुनिया, साक्षी मलिक और अन्य शीर्ष पहलवानों ने जंतर-मंतर पर धरना देते हुए बृजभूषण शरण सिंह पर नाबालिग सहित कई महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न और डराने-धमकाने के गंभीर आरोप लगाए थे। पहलवानों का आरोप था कि सिंह अपने पद का दुरुपयोग कर वर्षों से महिला एथलीटों का शोषण कर रहे हैं। भारी जन दबाव और उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद दिल्ली पुलिस ने दो प्राथमिकी दर्ज की थीं, जिनमें से एक पॉक्सो अधिनियम के तहत थी। हालांकि, बाद में नाबालिग पहलवान के पिता ने अपना बयान बदल दिया था, जिससे मामले में नया मोड़ आ गया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 15 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज कराए, जिनमें पीड़ित पहलवानें, उनके परिजन और कोच शामिल थे। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और कुश्ती महासंघ पर नियंत्रण हासिल करने के लिए लगाए गए हैं। बृजभूषण शरण सिंह के वकील ने अदालत में दलील दी कि शिकायतकर्ताओं के बयानों में विरोधाभास हैं और घटना के समय और स्थान को लेकर स्पष्टता नहीं है। अदालत ने सबूतों के अभाव और गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए आरोपियों को बरी करने का निर्णय सुनाया। फैसले के तुरंत बाद बृजभूषण शरण सिंह ने मीडिया से बात करते हुए कहा, "सत्य की जीत हुई है। न्यायपालिका पर मेरा भरोसा और मजबूत हुआ है।" उन्होंने इसे अपने खिलाफ रची गई साजिश करार दिया। वहीं, पहलवानों की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन उनके करीबी सूत्रों ने फैसले पर निराशा जताते हुए ऊपरी अदालत में अपील करने के संकेत दिए हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह 'बेटी बचाओ' के नारे की विफलता है, जबकि भाजपा ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है। इस फैसले का भारतीय खेल प्रशासन और महिला एथलीटों की सुरक्षा पर दूरगामी असर पड़ने की संभावना है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अभियोजन पक्ष की विफलता जांच प्रक्रिया में खामियों की ओर इशारा करती है। पहलवानों के पास अब दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प खुला है। यह मामला देश में कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा और ताकतवर लोगों के खिलाफ आवाज उठाने वालों के सामने आने वाली चुनौतियों को फिर से रेखांकित करता है। आगे की कानूनी लड़ाई तय करेगी कि यह संघर्ष किस दिशा में जाता है।