सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) के प्रमुख सदस्य अभिजीत दीपके की अमेरिकी शिक्षा के खर्च को लेकर उठे विवाद पर अब उन्होंने विस्तृत सफाई पेश की है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ता द्वारा उनके बोस्टन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के वित्तीय स्रोतों पर सवाल उठाए जाने के बाद दीपके ने स्पष्ट किया है कि उनकी पढ़ाई का खर्च विश्वविद्यालय से मिली स्कॉलरशिप और एजुकेशन लोन के माध्यम से पूरा हुआ था। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में स्कॉलरशिप लेटर सार्वजनिक करने की बात भी कही है। इस मामले ने सोशल मीडिया और मीडिया हलकों में काफी चर्चा बटोरी है। आरटीआई कार्यकर्ता ने दीपके के पिता की वित्तीय स्थिति और सीजेपी के डिफेंस फंड को लेकर भी जांच की मांग की थी। इसके जवाब में सीजेपी की ओर से पलटवार करते हुए कहा गया कि अगर पारदर्शिता की बात हो रही है तो पीएम केयर्स फंड की भी जांच होनी चाहिए। संगठन का कहना है कि दीपके की शिक्षा को लेकर लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं और उनका मकसद केवल सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना है। दीपके ने भी दोहराया है कि उनके पास सभी दस्तावेज मौजूद हैं और वे किसी भी जांच के लिए तैयार हैं। इस पूरे प्रकरण में कई मीडिया संस्थानों ने अपनी रिपोर्ट्स में अलग-अलग पहलुओं को उजागर किया है। जहां कुछ रिपोर्ट्स में दीपके के स्कॉलरशिप और लोन के दावे को प्रमुखता दी गई है, वहीं अन्य में सीजेपी के पीएम केयर्स फंड पर दिए बयान को विवादित बताया गया है। टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के अनुसार आरटीआई कार्यकर्ता ने दीपके के पिता की आय के स्रोतों और सीजेपी को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए आधिकारिक जांच की मांग की है। इंडिया टुडे से बातचीत में दीपके ने कहा कि वे अपना स्कॉलरशिप लेटर दिखाने को तैयार हैं, बस आरोप लगाने वाले उसे देखने की हिम्मत दिखाएं। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस तरह के विवाद गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की विश्वसनीयता पर असर डाल सकते हैं। हालांकि, यह भी सच है कि आरटीआई कानून का उपयोग किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से प्रताड़ित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। दीपके के मामले में उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड और वित्तीय दस्तावेजों की पारदर्शिता ही असली तस्वीर साफ करेगी। सीजेपी का पीएम केयर्स फंड का जिक्र करना राजनीतिक रंग देता दिख रहा है, जिससे मामला और पेचीदा हो गया है। अंत में यह कहा जा सकता है कि अभिजीत दीपके ने अपने पक्ष में ठोस दस्तावेज होने का दावा किया है और जांच के लिए तैयार हैं। आरटीआई कार्यकर्ता की मांग और सीजेपी का जवाबी हमला, दोनों ही लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हैं। जरूरत इस बात की है कि तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाएं, न कि आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर। आने वाले दिनों में यदि दीपके अपने दस्तावेज सार्वजनिक करते हैं तो विवाद स्वतः शांत हो सकता है, अन्यथा यह मामला लंबा खिंच सकता है और सामाजिक संगठनों की पारदर्शिता पर नई बहस छेड़ सकता है।