नोएडा की एक किशोरी ने दिल्ली में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग करने के लिए एक बार फिर सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है। इस किशोरी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। किशोरी ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा कि वह दूसरों के बहकावे में आ गई थी और उसने आवेश में आकर प्रधानमंत्री के लिए अपशब्द कहे थे। उसने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा माफ किए जाने को अपने जीवन की सबसे बड़ी घटना बताया और कहा कि यह उसके लिए 'जीवनदान' के समान है। दरअसल, कुछ दिन पहले दिल्ली में आयोजित एक विरोध प्रदर्शन के दौरान इस किशोरी ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए बेहद आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया था। इसका वीडियो तेजी से वायरल हुआ और देशभर में इसकी कड़ी निंदा हुई। पुलिस ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच शुरू की थी। किशोरी ने बाद में एक वीडियो जारी कर अपनी हरकत पर खेद जताया था, लेकिन अब उसने एक बार फिर से प्रधानमंत्री से क्षमा याचना की है। उसने कहा कि वह नादानी और दूसरों के उकसावे में आकर ऐसा कर बैठी, जिसका उसे गहरा पछतावा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पूरे प्रकरण पर बेहद उदार रुख अपनाते हुए किशोरी को माफ कर दिया। प्रधानमंत्री की इस सहनशीलता और बड़प्पन की किशोरी की मां ने भूरी-भूरी प्रशंसा की है। मां ने भावुक होते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने उनकी बेटी को 'जीवनदान' दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वे उनकी बेटी को 'गोद' लें और उसका मार्गदर्शन करें। मां ने कहा कि प्रधानमंत्री की क्षमा ने उनकी बेटी को नया जीवन दिया है और पूरा परिवार उनका ऋणी है। इस घटना पर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। जहां एक वर्ग प्रधानमंत्री की उदारता और बड़े दिल की सराहना कर रहा है, वहीं कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सत्ताधारी दल के आईटी सेल और समर्थकों द्वारा इसी तरह की भाषा का प्रयोग करने वालों पर भी ऐसी ही नरमी बरती जाती है। कई यूजर्स ने इसे प्रधानमंत्री की राजनीतिक परिपक्वता और सहनशीलता का परिचायक बताया है। अंत में, किशोरी ने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा माफ किया जाना उसके लिए बहुत बड़ी बात है और वह इस घटना से सबक लेकर भविष्य में कभी भी ऐसी गलती नहीं दोहराएगी। उसने देश के युवाओं से अपील की कि वे विरोध प्रदर्शन के दौरान मर्यादा न लांघें और अपनी बात संवैधानिक दायरे में रहकर रखें। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार और सहनशीलता के महत्व को रेखांकित किया है।