चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही महत्वपूर्ण सुनवाई में केंद्र सरकार ने जोरदार तर्क देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री पर यह मान लेना गलत होगा कि वे लोकतंत्र के विरुद्ध कार्य करेंगे। सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने अदालत के समक्ष दलील दी कि प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति की निष्ठा और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता पर संदेह नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में प्रधानमंत्री की भूमिका को संदेह की नजर से देखना संवैधानिक मर्यादा के अनुकूल नहीं है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को बाहर रखे जाने पर गंभीर सवाल उठाए। न्यायमूर्ति की पीठ ने पूछा कि क्या यह निष्पक्षता का प्रदर्शन नहीं है? अदालत ने टिप्पणी की कि सीजेआई को पैनल से बाहर रखने से नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगता है। इस पर सरकार ने तर्क दिया कि मौजूदा कानून संसद द्वारा पारित है और इसमें कार्यपालिका की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि नया कानून चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करता है और यह संविधान के अनुच्छेद 324 की भावना के विपरीत है। उन्होंने मांग की कि नियुक्ति पैनल में सीजेआई को शामिल किया जाए ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष और विश्वसनीय बनी रहे। लाइव लॉ और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस मामले का दूरगामी असर भारतीय चुनाव प्रणाली पर पड़ेगा। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता लोकतंत्र की आधारशिला है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यह तय करेगा कि भविष्य में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति किस प्रक्रिया से होगी। सभी पक्षों की निगाहें अब शीर्ष अदालत के फैसले पर टिकी हैं।