📰 Kotputli News
Breaking News: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने न्यायपालिका पर उठाए सवाल, कहा- गंगा में चिकन खाने या गाजा के लिए प्रदर्शन करने पर कोई कानून नहीं
🕒 1 hour ago

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि देश में लोकतांत्रिक स्थान सिकुड़ रहा है और असहमति की आवाज को दबाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गंगा नदी में नाव पर चिकन या बिरयानी खाने अथवा गाजा के समर्थन में प्रदर्शन करने जैसे कार्यों के विरुद्ध कोई कानून नहीं है, फिर भी छात्रों को गिरफ्तार किया जा रहा है और उन्हें जमानत तक नहीं दी जा रही। यह टिप्पणी उन्होंने एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें छात्रों को महज प्रदर्शन करने के आरोप में हिरासत में लिया गया था। न्यायमूर्ति भुइयां ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि छात्रों को केवल विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के लिए जेल भेजा जा रहा है, जो संवैधानिक अधिकारों का हनन है। उन्होंने एक घटना का जिक्र किया जहां गंगा नदी में नाव पर बिरयानी खाने के आरोप में गिरफ्तार छात्रों को जमानत देने से इनकार कर दिया गया। न्यायाधीश ने पूछा कि आखिर किस कानून के तहत नदी में भोजन करना अपराध माना जा सकता है? उन्होंने जोर देकर कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार हैं, जिनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति भुइयां ने आगे कहा कि देश में लोकतांत्रिक स्पेस लगातार कम हो रहा है और असहमति जताने वालों पर कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने न्यायपालिका से अपील की कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आए और मनमानी गिरफ्तारियों पर रोक लगाए। बार एंड बेंच और लाइव लॉ जैसी कानूनी समाचार वेबसाइटों ने इस टिप्पणी को प्रमुखता से प्रकाशित किया है। द वायर ने भी न्यायमूर्ति भुइयां के हवाले से लिखा है कि भारत में असहमति की जगह सिकुड़ रही है और छात्रों को प्रदर्शन के लिए गिरफ्तार किया जा रहा है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देशभर में विभिन्न मुद्दों पर छात्रों और नागरिक समाज के प्रदर्शनों पर कार्रवाई की खबरें आ रही हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायमूर्ति भुइयां की यह टिप्पणी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने जमानत देने में देरी और मनमाने ढंग से गिरफ्तारियों पर भी चिंता जताई। सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ न्यायाधीश द्वारा इस तरह की स्पष्ट टिप्पणी न्यायिक जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। निष्कर्षतः, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की यह टिप्पणी भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। उनकी यह चेतावनी कि "लोकतांत्रिक स्थान सिकुड़ रहा है" सरकार, न्यायपालिका और नागरिक समाज सभी के लिए एक चेतावनी है। अब यह देखना होगा कि इस टिप्पणी का जमीनी स्तर पर क्या असर पड़ता है और क्या जमानत एवं गिरफ्तारी के मामलों में न्यायपालिका अधिक संवेदनशील रुख अपनाती है। संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की रक्षा ही किसी भी जीवंत लोकतंत्र की असली कसौटी होती है।

Stay connected with Kotputli News for latest updates.


📲 Share on WhatsApp
✍️ By Pradeep Yadav | 27 Jul 2026