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Breaking News: यूपी 2027 के लिए ओवैसी का अखिलेश को गठबंधन का प्रस्ताव, भाजपा ने बताया 'फ्रेंड रिक्वेस्ट'
🕒 1 hour ago

उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से सरगर्मियां तेज हो गई हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को भाजपा को हराने के लिए प्री-पोल गठबंधन का खुला प्रस्ताव दिया है। ओवैसी ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी सपा के साथ-साथ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से भी हाथ मिलाने को तैयार है। उन्होंने अखिलेश यादव को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर वह इस प्रस्ताव को ठुकराते हैं तो बाद में रोने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचेगा। इस बयान ने यूपी के राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। ओवैसी ने एक विशेष साक्षात्कार में दावा किया कि भाजपा को उत्तर प्रदेश में रोकने के लिए धर्मनिरपेक्ष ताकतों का एकजुट होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि पिछले चुनावों में वोटों के बंटवारे का फायदा भाजपा को मिला है, इसलिए इस बार रणनीतिक साझेदारी समय की मांग है। एआईएमआईएम प्रमुख ने जोर देकर कहा कि उनकी पार्टी मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्गों के मुद्दों पर मुखरता से लड़ती रही है और गठबंधन होने पर ये वोट बैंक निर्णायक साबित हो सकता है। हालांकि, सपा या बसपा की ओर से अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे ओवैसी की ओर से एक बड़े दांव के रूप में देख रहे हैं। वहीं, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने ओवैसी के इस प्रस्ताव पर तीखा तंज कसा है। भाजपा नेताओं ने इस गठबंधन की पेशकश को "फ्रेंड रिक्वेस्ट" और "दोस्ती का अनुरोध" करार देते हुए खारिज कर दिया। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि ओवैसी और अखिलेश यादव की राजनीति एक-दूसरे के विरोधाभासी रही है और यह गठजोड़ केवल सत्ता प्राप्ति का अवसरवादी प्रयास है। भाजपा ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश की जनता विकास और सुशासन के मुद्दे पर वोट देती है, न कि जाति-पंथ के आधार पर बने अवसरवादी गठबंधनों पर। पार्टी ने इसे विपक्ष की हताशा का प्रतीक बताया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 के चुनाव में अभी काफी समय है, लेकिन ओवैसी की इस पहल ने विपक्षी एकता की संभावनाओं और चुनौतियों दोनों को सामने ला दिया है। सपा के लिए यह प्रस्ताव एक दुविधा की स्थिति पैदा करता है क्योंकि एक ओर मुस्लिम वोट बैंक को साधने का दबाव है तो दूसरी ओर ओवैसी की पार्टी के साथ जाने से अपने कोर वोट बैंक में नाराजगी का खतरा भी है। बसपा सुप्रीमो मायावती पहले ही गठबंधन की राजनीति से दूरी बनाए रखने का संकेत दे चुकी हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में यह सियासी शतरंज किस करवट बैठती है। निष्कर्षतः, असदुद्दीन ओवैसी का यह प्रस्ताव यूपी की राजनीति में एक नए समीकरण की आहट है। भाजपा की "फ्रेंड रिक्वेस्ट" वाली टिप्पणी जहां विपक्ष की एकजुटता को हल्का करने का प्रयास है, वहीं ओवैसी का "बाद में मत रोना" वाला बयान दबाव की राजनीति का हिस्सा लगता है। असली तस्वीर तो तब साफ होगी जब सपा और बसपा इस पर अपना रुख स्पष्ट करेंगी। तब तक यह सियासी पैंतरेबाजी प्रदेश की जनता के लिए चर्चा का विषय बनी रहेगी।

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✍️ By Pradeep Yadav | 26 Jul 2026