विश्व पासपोर्ट सूचकांक 2026 ने हाल ही में भारत के पासपोर्ट को 125वें स्थान पर रखा, जिससे पिछले वर्ष की रैंकिंग से एक स्थान नीचे गिरावट आई। इस सूचकांक में देशों को उनके पासपोर्ट धारण करने वाले नागरिकों की यात्रा स्वतंत्रता के आधार पर क्रमबद्ध किया जाता है। भारत का पासपोर्ट अब 100 से बाहर रहने वाले देशों में शामिल हो गया, जबकि कई यूरोपीय देशों ने शीर्ष दस में आक्रमण किया है। इस बदलाव ने भारतीय यात्रियों के बीच चर्चा को जन्म दिया है और सरकार को भी इस संकेत को गंभीरता से लेने के लिए प्रेरित किया है। सूचकांक के अनुसार, संयुक्त राज्य, जर्मनी, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे देश अपने पासपोर्ट धारणकर्ताओं को 190 से अधिक देशों में बिना वीज़ा या आगमन पर वीज़ा की सुविधा प्रदान करके शीर्ष पर स्थित हैं। वहीं यूरोप के कई देशों ने लगातार शीर्ष स्थानों पर कब्ज़ा किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यात्रा स्वतंत्रता में यूरोपीय देशों का प्रभुत्व बढ़ा है। भारत की रैंकिंग में गिरावट का मुख्य कारण वीज़ा प्रतिबंधों की बढ़ी हुई संख्या और कुछ प्रमुख पर्यटन गंतव्यों में यात्रा के लिए अतिरिक्त दस्तावेजी प्रक्रियाओं का लागू होना माना जा रहा है। इस रिपोर्ट के बाद कई विशेषज्ञों ने कहा है कि भारत को पासपोर्ट को मजबूत करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों को तेज़ करने, द्विपक्षीय वीज़ा समझौतों को विस्तारित करने और विदेशियों के साथ शर्तों को सरल बनाने पर काम करना चाहिए। साथ ही, यात्रा उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए वीज़ा प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर तेज़ी से निर्णय लेने की प्रणाली अपनानी होगी। सरकार ने पहले भी विभिन्न देशों के साथ वीज़ा मुक्त सहयोग बढ़ाने की योजना बनाई हुई थी, परंतु इस वर्ष की गिरावट से यह स्पष्ट होता है कि कार्यान्वयन में गति की कमी रही है। आगे बढ़ते हुए, भारतीय यात्रियों को वीज़ा प्रक्रिया में बदलावों और नई शर्तों पर सतर्क रहने की सलाह दी जाती है। साथ ही, पर्यटन और व्यापार को सुगम बनाने हेतु विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। यदि सरकार ने इस दिशा में ठोस कदम उठाए, तो भविष्य में भारत की रैंकिंग पुनः ऊँची हो सकती है और भारतीय नागरिकों को विश्वभर में अधिक सुविधाजनक यात्रा का आनंद मिल सकेगा।