कांग्रेस ने हाल ही में अयोध्या राम मंदिर के दान कांड को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी को दोहरी मानदंड का उदाहरण बताया है। अध्यक्ष रघवेंद्र सिंह धवन ने संसद के प्रश्नकाल में कहा कि जब शिखर योजना के तहत मंदिर निर्माण पर चल रहे दान में अनियमितताओं की जानकारी मिली, तो केंद्र सरकार ने सूचना का संज्ञान लेकर तुरंत सख्त कदम उठाने चाहिए थे। परन्तु वही सरकार, जो अक्सर विरोधियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाती है, इस मामले में पूरी तरह से मौन रहने का चयन कर रही है। कांग्रेस ने इसे "बिजेपी की दोहरी सोच" कहा, जहाँ विपक्षी दलों की आलोचना करने के बाद अपने पक्ष में होने वाले अनुचित कार्यों को अनदेखा किया जाता है। दावा है कि मंदिर निधि से जुड़े कई बड़े दानदाता, जिनमें कुछ उद्योगपति और धनी वर्ग के लोग शामिल हैं, उनपर अनैतिक लेनदेन और जुड़ाव का आरोप है। इस संदर्भ में हाल ही में जारी एक वीडियो में पाँच प्रमुख आरोपी को बड़े नकद बंडलों को निकालते और छुपाते दिखाया गया है, जिससे धन के उपयोग में पारदर्शिता की कमी स्पष्ट हो रही है। इसके साथ ही अयोध्या के वकीलों ने भी एक मार्च किया, जिसमें उन्होंने इस कांड में शामिल प्रमुख व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर की मांग की। इस दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वेंकटेश्वरनु गुप्ता ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की और मंत्रियों एवं प्राधिकारी को जिम्मेदार ठहराया। बिजेपी के पक्ष ने कहा है कि दान संबंधी किसी भी अनियमितता पर तत्काल जांच चल रही है और अगर कोई गलती सिद्ध हुई तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह मुद्दा राजनीतिक रूप से प्रयोग किया जा रहा है, जिससे असली समस्या के समाधान में देरी हो रही है। परन्तु कांग्रेस ने इस बात को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि पार्टी ने हमेशा लोकतांत्रिक संस्थानों की भूमिका को सुदृढ़ करने की वकालत की है और इस तरह की समस्याओं को छुपाने के बजाय जनता को सच्चाई बताने की आवश्यकता है। इस कांड ने जनता के बीच भी बड़ी उलझन पैदा कर दी है। कई सामाजिक संगठनों ने कहा है कि मंदिर निर्माण का पवित्र कार्य है, परंतु जब धन के स्रोत और उसका प्रयोग अस्पष्ट रहे तो इस धर्मिक प्रोजेक्ट की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं। कुछ विशेषज्ञों ने कहा कि इस तरह के कांड को रोकने के लिए धनराशि संग्रहण में पारदर्शी प्रणाली अपनानी चाहिए, जिससे प्रत्येक दानदाता और प्राप्तकर्ता की जानकारी सार्वजनिक हो सके। इस दिशा में कई राज्य सरकारें पहले ही कदम उठा रही हैं, परन्तु केंद्र में इस पर ठोस उपाय नहीं दिख रहे हैं। अंततः कांग्रेस ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा, ध्रुवीकरण और आर्थिक पारदर्शिता के शीर्ष विषयों में गिनाया है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह तुरंत एक स्वतंत्र और न्यायिक जांच आयोग स्थापित करे, जिससे इस कांड के सभी पहलुओं को उजागर किया जा सके। यदि प्रधानमंत्री और उनका दल इस मामले में सच्ची स्वच्छता सिद्ध करने में असफल रहते हैं, तो यह केवल उनकी राजनीतिक क्षमताओं को ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की पृष्ठभूमि को भी ठेस पहुंचाएगा। जनता की नज़र में इस तरह की दोहरी मानदंड की प्रवृत्ति को रोकना, न सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का मूल सिद्धान्त भी है।