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Breaking News: सुप्रीम कोर्ट ने एआई‑जनित झूठी उद्धरणों को लेकर NCLT का फ़ैसला रद्द किया, BCI को जांच का आदेश
🕒 1 hour ago

भारत के न्यायिक इतिहास में एक नई चुनौती ने मंच पर कदम रखा है—कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उत्पन्न नकली केस उद्धरण। सर्वोच्च न्यायालय ने इस समस्या को लेकर अपना स्पष्ट रुख अपना लिया है। एक हालिया सार्वजनिक सुनवाई में, अदालत ने राष्ट्रीय कंपनी विधि टैक्स ट्राइब्यूनल (NCLT) द्वारा अपनाए गए एक निर्णय को अस्थायी रूप से रद्द कर दिया, क्योंकि उस निर्णय में एआई द्वारा निर्मित, असत्य और काल्पनिक पूर्वनिर्णयों का हवाला दिया गया था। यह कदम न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को बचाने के लिए अत्यंत आवश्यक माना गया, क्योंकि अदालत ने कहा कि ऐसे ‘हैलुसिनेटेड’ उद्धरण न्याय प्रणाली के लिए 'विनाशकारी' हो सकते हैं। सुनवाई के दौरान माना गया कि जब वकीलों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों में ऐसे अनुचित एआई‑जनित उद्धरण शामिल होते हैं, तो न्यायिक निर्णय की वैधता ही प्रश्नविचार का विषय बन जाती है। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे उद्धरणों को नज़रअंदाज़ करना या उन्हें अस्थिर मान लेना, न्यायाधीशों और पक्षकारों दोनों के लिए वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने में मदद करेगा। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश दिया है कि वह एआई‑उपकरणों के उपयोग पर एक विस्तृत मार्गदर्शिका तैयार करे, जिससे भविष्य में ऐसी त्रुटियों से बचा जा सके और वकीलों को सही रूप‑रंग में एआई की सहायता लेने के लिए मार्गदर्शन मिल सके। इस निर्णय ने वकीलों और कानूनी पेशेवरों के बीच हड़बड़ी से उठे प्रश्नों को भी उजागर किया। कई बार देखा गया कि एआई‑आधारित शोध उपकरण तेज़ी से जानकारी प्रदान कर देते हैं, परंतु उनके एल्गोरिद्म में मौजूद त्रुटियों के कारण कभी‑कभी निराधार या अतिरंजित केसों का हवाला दिया जा सकता है। इस कारण आधिकारिक नियामक निकायों को अब एआई‑सॉफ्टवेयर के मानक परीक्षण, प्रमाणन और उपयोग के लिए सख्त नियम बनाने पड़ेंगे। बेशक, एआई के सकारात्मक पहलुओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता; फिर भी, न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि तकनीकी प्रगति को नैतिकता और विश्वसनीयता के साथ संतुलित करना अनिवार्य है। न्यायिक प्रणाली के भविष्य को आकार देने वाली इस नई लहर में, भारतीय न्याय प्रशासन को चुनौती का सामना करने के साथ-साथ अवसर भी मिल रहा है। यदि बार काउंसिल द्वारा तैयार किए गए दिशानिर्देश स्पष्ट, कठोर और व्यावहारिक हों, तो वकील एआई की शक्ति का उचित उपयोग करके अपने मामलों को बेहतर रूप से तैयार कर सकेंगे, जबकि न्यायालय को झूठी सूचना के जाल में फँसने से बचाया जा सकेगा। यही वह संतुलन है जिसे अब भारतीय न्याय व्यवस्था को स्थापित करना है—तकनीकी नवाचार को न्याय के मूल सिद्धांतों के साथ मेल करना। अंत में कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्ट संकेत भविष्य में एआई के अनियंत्रित उपयोग को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इस निर्णय ने न केवल NCLT के एक विशेष आदेश को उलट दिया, बल्कि पूरे न्यायिक क्षेत्र में एआई‑जनित डेटा के उपयोग के लिए एक पूर्वानुमेय ढाँचा भी प्रदान किया। अब बार काउंसिल और अन्य नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे इस दिशा में ठोस कदम उठाएँ, ताकि भारतीय न्याय प्रणाली को तकनीकी उन्नति के साथ-साथ पारदर्शिता और विश्वसनीयता भी मिले।

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✍️ By Pradeep Yadav | 02 Jul 2026