ऑपरेशन टाइगर, जो महाराष्ट्र में उधव थाकरेघे की राष्ट्रीय्यतावादी पार्टी (सना‑UBT) को दो हिस्सों में बाँटने की योजना थी, अब गंभीर मोड़ पर खड़ा है। इस योजना के तहत छह सना (UBT) सांसदों को एक अलग समूह बनाकर शिंदे सरकार में शामिल करने का प्रयास किया जा रहा था, लेकिन छह में से दो सांसदों ने पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए, जिससे इस पहल को गंभीरतम असफलता का सामना करना पड़ रहा है। उधव थाकरेघे के पक्षकारों ने दल के भीतर के असंतोष को दो मुख्य बिंदुओं में बाँटा – पहला, पार्टी के आंतरिक संगठन में शीर्ष स्तर तक पहुँचने की इच्छा, और दूसरा, शिंदे सरकार के साथ मिलकर शासन में भागीदारी का अवसर। इस दृष्टिकोण के तहत बनाए जाने वाले अलग समूह को 'सना (UBT) रेफ़ॉर्मर्स' कहा गया था, जिसके पक्ष में पाँच सांसदों ने पहले ही अपना समर्थन दिया था। परन्तु दो सांसदों ने, जो राज्य के प्रमुख क्षेत्रों से चुने गए हैं, इस प्रस्ताव को अड़ियल विरोध के साथ खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यह कदम जनता के विश्वास का उल्लंघन है और पार्टी की मूलधारा के सिद्धांतों के खिलाफ है। इन दो सांसदों के लगातार इनकार से सना (UBT) के भीतर फट गया है। कई स्रोतों के अनुसार, उन्होंने स्पीकर को लिखी गई एक औपचारिक पत्र के माध्यम से अपने बिनाआवश्यकता को जताया। इस पत्र में उन्होंने कहा कि पार्टी का कोई भी विभाजन केवल सत्ता की लालसा का प्रतीक है, न कि मतदाताओं की आकांक्षा। इसके साथ ही, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी इस विकास को ‘जनसम्बंधी शासन के विपरीत’ कहा, और इसे ‘जनधारा के विश्वास पर अपमान’ के रूप में निंदा की। इस बीच, थाकरेघे के निकटतम सहयोगियों ने सूचित किया कि वे इस स्थितिके समाधान के लिए तेज़ी से कदम उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आगामी दिनों में एक नई घोषणा आने की सम्भावना है, जिसमें समूह के गठन की प्रक्रिया को पुनः विचार किया जाएगा। यदि इस योजना को दोबारा नहीं चलाया गया, तो सना (UBT) का भविष्य अनिश्चित रह सकता है और शिंदे सरकार के साथ संभावित गठजोड़ भी प्रभावित हो सकता है। निष्कर्षतः, ऑपरेशन टाइगर की इस नई अड़चन से यह स्पष्ट होता है कि राजनैतिक गठबंधन केवल कागज पर नहीं बन सकता, बल्कि उसे जमीनी स्तर पर समर्थन और जनविश्वास की आवश्यकता होती है। दो सांसदों की निरंतर असहमति सना (UBT) को एक कठिन मोड़ पर ला रही है, जहाँ से आगे का रास्ता तय करने के लिए पार्टी को अपने मूल सिद्धांतों और मतदाताओं की आशाओं पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। यदि इस मुद्दे का समाधान नहीं निकाला गया, तो न केवल सना (UBT) की आंतरिक एकता प्रभावित होगी, बल्कि महाराष्ट्र के राजनैतिक संतुलन पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।