त्रिनामूल कांग्रेस के भीतर हाल ही में उभरे गंभीर संकट ने राजनीति के प्रेमी श्रोताओं को चकित कर दिया है। दिडी दिदी के भरोसेमंद सहयोगी कल्याण बनर्जी ने दामोदर बैनर्जी को एक स्पष्ट अल्टिमेटम दिया है – "या तो अभिषेक को छोड़ो, या मुझे ही छोड़ो"। यह चेतावनी केवल एक व्यक्तिगत टकराव नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य की दिशा पर गहरा असर डाल सकती है। कल्याण बनर्जी, जो बार-बार दिदी के राजनैतिक मंत्रियों के बीच मध्यस्थता करने वाले माने जाते रहे हैं, अब इस बयान के बाद अपनी पार्टी में पद से इस्तीफा देकर, हाई कोर्ट के चल रहे मामलों में अपने काउंसल के पद से भी हट रहे हैं। उनका यह कदम अभिषेक बैनर्जी के प्रति बढ़ते असंतोष और दिदी द्वारा उन्हें दोहरे मानकों के तहत जज करने के बाद आया है। इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में अभिषेक बैनर्जी के तेज़ी से उभरते राजनीतिक प्रभाव को समझा जा सकता है। कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अभिषेक को शेष पार्टी के बड़े नेताओं को पीछे धकेलने की कोशिश के रूप में देखते हैं, जबकि दिदी ने अक्सर कहा है कि वह अभिषेक को "लीडरशिप टेस्ट" के रूप में देख रही हैं। इस बीच, कल्याण बनर्जी ने अपने बयान में स्पष्ट शब्दों में कहा कि "अगर दिदी दिडी अभी भी हमें शरण देने से इनकार करती हैं तो अभिषेक का अहंकार पार्टी के हितों के विरुद्ध है"। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने हाई कोर्ट के केस में अपना काउंसल पद त्याग दिया है, क्योंकि वह अभिषेक के सामने अपने खुद के अधिकारों को नहीं रख सकते। तिब्बती, अदीर, और विभिन्न क्षेत्रीय नेता इस विवाद के प्रति अपनी-अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं। कुछ ने कहा है कि दिदी को यह निर्णय लेना चाहिए कि वह कौनसे लोगों को पार्टी की बुनियाद में रखना चाहती हैं, और यह भी कहा है कि इस तरह के कट्टरपंथी बयानों से पार्टी का सार्वजनिक इमेज नकारात्मक हो सकता है। दूसरी ओर, कुछ पक्षों ने सुझाव दिया है कि यह अल्टिमेटम दिदी के लिए एक अवसर भी हो सकता है, जिससे वह अभिषेक के निरंकुश व्यवहार को रोक सकें और पार्टी के भीतर संतुलन बना सकें। अंत में, यह कहना मुश्किल है कि यह तंगी वाला उत्तर का क्या परिणाम देगा। दिदी दिडी ने अभी तक इस बात पर टिप्पणी नहीं की है कि वह अभिषेक बैनर्जी को किस हद तक समर्थन देंगी और उनके साथ हुए इस चुनावी रणनीति में कौनसे बदलाव करेंगे। हालांकि, यह स्पष्ट है कि त्रिनामूल कांग्रेस को अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा किया गया है, जहाँ दिदी के फैसले न केवल पार्टी के नेतृत्व को, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी परिवर्तन का कारण बन सकते हैं। समय ही बताएगा कि "या तो अभिषेक या मैं" का अल्टिमेटम किस दिशा में पार्टी को ले जाएगा, परन्तु इस संघर्ष के परिणामस्वरूप त्रिनामूल की आंतरिक संरचना में गहरा परिवर्तन अवश्य होगा।