नई दिल्ली: संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आज इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को इराक, ईरान या किसी भी मध्य पूर्वी राज्य पर सीधे सैन्य हमले से रोकने का आग्रह किया, जबकि उन्होंने कहा कि ईरान के साथ शांति समझौते की चर्चा "बहुत ही निकट" है। यह बयान इस समय आया है, जब ईरान और इज़राइल के बीच पहले ही हफ्ते में कई बार हथियारबंद टकराव देखे गए हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारी चिंता व्याप्त है। ट्रम्प ने अपने बयान में बताया कि उनका मानना है कि निदान के तहत किए जा रहे कूटनीतिक प्रयास अंततः दोनों देशों के बीच एक स्थायी समझौते तक पहुंचाएंगे। उन्होंने कहा, "हम सब चाहते हैं कि क्षेत्र में शांति स्थापित हो, और मैं इज़राइल को इस दिशा में कदम उठाने का समर्थन करता हूं।" इस बीच, उन्होंने इज़राइल को इस बात पर बल दिया कि अगर उन्होंने ईरान पर हमला किया, तो इससे क्षेत्रीय तनाव और भी बढ़ सकता है, और अमेरिकी हितों को भी नुकसान पहुंच सकता है। ईरान ने इस सन्दर्भ में पहले ही इज़राइल के कुछ सैन्य ठिकानों पर मिसाइलों की एक श्रृंखला चलाने की घोषणा की थी, यह दावा किया कि इज़राइल ने अपने सीमाओं का उल्लंघन किया है। इस कार्रवाई के बाद इज़राइल ने भी प्रत्युत्तर में ईरान के सैन्य ठिकानों पर बमबारी की थी, जिससे दोनों देशों के बीच पहले से ही बिगड़ी हुई तनाव की दशा और भी बढ़ गई। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने रिपोर्ट किया कि इस बार के टकराव में कई नागरिकों की जानें और संपत्ति को नुकसान पहुंचा है। ट्रम्प के इस कदम को कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने कूटनीति के महत्व को बढ़ावा देने वाले सकारात्मक संकेत के रूप में देखा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान और इज़राइल के बीच एक उचित समझौता दोनों देशों को क्षेत्रीय क्षमताओं का पुनर्संतुलन करने और आर्थिक व सामाजिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देगा। वहीं, इज़राइल के कुछ राजनेता इस पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि शांति पूर्ण समझौते के लिए ईरान को पहले अपने परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करना होगा, जो अभी तक एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। अंततः, ट्रम्प ने इस मुद्दे पर आगे के कूटनीतिक प्रयासों को जारी रखने का आश्वासन देते हुए कहा कि "अगर दोनों पक्ष संवाद के माध्यम से समाधान निकालेंगे, तो हम सबको लाभ होगा"। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा को फिर से गर्माया है, और यह देखना बाकी है कि इज़राइल, ईरान और अमेरिका की भविष्य की रणनीती इस संवेदनशील जियोग्राफिकल स्थिति को कैसे प्रभावित करेगी।