संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ संभावित समझौते के लिए अपने शर्तें स्पष्ट कर दीं। उन्होंने कहा कि जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित नहीं करता और संघर्ष-रहित शांति स्थापित नहीं करता, तब तक अमेरिका कोई भी प्रतिबंध राहत, ईरानी संपत्तियों का अनफ्रोजन या लेबनान के मुद्दे पर वार्ता नहीं करेगा। इस स्पष्ट रुख ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई सवाल उठाए हैं, क्योंकि पिछले सालों में ईरान के साथ कई सौदे की कोशिशें हुई थीं, परन्तु अब ट्रम्प ने अपनी नीति को कठोर कर दिया है। ट्रम्प ने बताया कि ईरान को पहले एक स्थायी युद्धविराम (सीज़फायर) तक पहुंचना होगा, जिसके बाद ही अमेरिकी पक्ष किसी भी प्रकार की आर्थिक राहत देने को तैयार होगा। उन्होंने कहा, "जब तक ईरान अपने हथियारों को रोक नहीं लेता, तब तक हम उसकी संपत्तियों को अनफ़्रीज़ नहीं करेंगे।" इस बयान में उन्होंने दोहराया कि संयुक्त राज्य कोई भी मध्यस्थता नहीं करेगा जब तक ईरान लेबनान में अपने प्रभाव को कम नहीं करता। ट्रम्प की इस पंक्ति के पीछे अमेरिकी राजनीति में घरेलू दबाव भी काम कर रहा है। कई संसद सदस्य और अमेरिकी जनता ने ईरान के खिलाफ कड़ी रुख अपनाने की मांग की है, विशेषकर यूएस के एशिया-प्रशांत क्षेत्र में प्रभाव बनाए रखने के लिये। ट्रम्प ने यह भी संकेत दिया कि अगर ईरान समझौते की शर्तों को मानता नहीं है, तो अमेरिका उसके यूरेनियम को नष्ट करने की रणनीति अपना सकता है, जैसा कि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के बयान में उल्लेखित है। इन बयानों के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मिश्रित प्रतिक्रिया दी है। यूरोपीय देशों ने कहा कि कूटनीतिक वार्ता को जारी रखना चाहिए, जबकि ईरानी अधिकारी इस रुख को "अवास्तविक" और "शांतिपूर्ण प्रक्रिया में बाधा" के रूप में आंक रहे हैं। ट्रम्प के इस कठोर रुख से मध्य पूर्व में मौजूदा तनाव बढ़ने का जोखिम है, विशेषकर जब इज़राइल और इराक के बीच संभावित टकराव का माहौल बन रहा है। अंत में कहा जा सकता है कि ट्रम्प ने ईरान के साथ समझौते की दिशा में एक स्पष्ट सीमा खींची है: बिना शर्त प्रतिबंध मुक्ति और संपत्तियों की मुक्तता नहीं होगी। यह नया मोड़ न केवल अमेरिकी विदेश नीति के मार्ग को बदलता है, बल्कि मध्य पूर्व में भविष्य के शांति प्रयासों पर गहरा असर डाल सकता है। यदि ईरान इन शर्तों को नहीं मानता, तो अमेरिकी दबाव और अनुशासन के स्रोतों में वृद्धि देखी जा सकती है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता के लिये एक नया संकट उत्पन्न हो सकता है।