उदयपुर के देबारी की पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक घाटा वाली माताजी का मंदिर मेवाड़ की लोकआस्था और गहरी श्रद्धा का एक अत्यंत प्रमुख केंद्र है। शारदीय नवरात्र के पावन पर्व के दौरान इस पवित्र स्थल पर देश-विदेश से आने वाले भक्तों का भारी तांता लगा रहता है। मंदिर परिसर की भव्यता और यहां की आध्यात्मिक ऊर्जा उदयपुर और संपूर्ण मेवाड़ क्षेत्र के सांस्कृतिक वैभव को जीवंत करती है, जहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं।
इस पवित्र स्थान के साथ कई ऐतिहासिक और चमत्कारी कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो पीढ़ियों से स्थानीय जनमानस की स्मृतियों में रची-बसी हैं। इनमें सबसे प्रमुख कथा मुगल सेना के आक्रमण के समय की है, जब आक्रमणकारी मुगल सेना इस क्षेत्र में आगे बढ़ रही थी। किंवदंतियों के अनुसार, माता की नाभि से निकले भ्रमरों और भौंरों के भयंकर हमले ने मुगल सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था, जिसे आज भी इस स्थान के चमत्कारी इतिहास के रूप में श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।
शुरुआती दौर में यह पवित्र स्थल एक साधारण नीम के पेड़ के नीचे स्थित एक छोटे से देवरा के रूप में हुआ करता था। समय के साथ स्थानीय भक्तों और मेवाड़ के जनसहयोग से इस स्थान का कायाकल्प हुआ और यह आज एक भव्य मंदिर, श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए धर्मशाला और लगभग 35 फीट ऊंचे विशाल त्रिशूल के रूप में स्थापित हो चुका है। यह भव्य त्रिशूल इस बात का प्रतीक है कि लोकआस्था किस प्रकार पीढ़ियों के सफर तय करते हुए एक विशाल सांस्कृतिक धरोहर में बदल जाती है।
मंदिर के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण मोड़ 1990 के दशक में आया, जब इस क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण कार्य की योजना बनाई गई। सड़क मार्ग के प्रस्तावित नक्शे के दायरे में मंदिर का मूल क्षेत्र आ रहा था, जिससे भक्तों में चिंता की लहर दौड़ गई। हालांकि, स्थानीय जनता की अटूट आस्था और मजबूत विरोध के चलते प्रशासन को झुकना पड़ा और मंदिर को बचाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण का रास्ता यानी एलाइनमेंट बदलना पड़ा।
प्रशासनिक स्तर पर लिया गया यह निर्णय इस बात का प्रमाण है कि लोकआस्था और सांस्कृतिक धरोहर का सम्मान करते हुए किस प्रकार विकास कार्यों को भी अंजाम दिया जा सकता है। सड़क का मार्ग बदले जाने के कारण उदयपुर और मेवाड़ की इस अमूल्य धरोहर को जरा भी क्षति नहीं पहुंची, और आज भी यह मंदिर अपनी पूरी दिव्यता के साथ देबारी की पहाड़ी पर सुशोभित है, जबकि आधुनिक राष्ट्रीय राजमार्ग इसके पास से सुरक्षित गुजरता है।
वर्तमान समय में मंदिर की देखरेख, व्यवस्था और विस्तार कार्य स्थानीय कमेटियों एवं ट्रस्ट द्वारा पूरी निष्ठा से संचालित किए जाते हैं। शारदीय नवरात्र के दौरान आने वाले विशाल जनसमूह को प्रबंधित करने के लिए विशेष प्रशासनिक और स्वयंसेवी व्यवस्थाएं की जाती हैं ताकि दर्शनार्थियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो। मंदिर परिसर में आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए बुनियादी सुविधाओं को निरंतर उन्नत किया जा रहा है।
भविष्य की योजनाओं के तहत उदयपुर जिला प्रशासन और स्थानीय समिति मिलकर इस ऐतिहासिक स्थल को धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर और अधिक मजबूती से स्थापित करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। मुगल सेना के पराभव और 1990 के दशक के सड़क परिवर्तन जैसे ऐतिहासिक प्रसंगों को आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने के साथ-साथ देबारी की पहाड़ी पर स्थित इस तीर्थ स्थल पर आने वाले भक्तों की सुविधाओं में और अधिक विस्तार करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है।