अलवर जिले के मालाखेड़ा क्षेत्र के बड़ेर गांव में पेयजल संकट ने अत्यंत गंभीर रूप ધારણ कर लिया है, जिससे लगभग चार हजार की आबादी के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। नियमित और सुचारू पानी की आपूर्ति के अभाव में स्थानीय ग्रामीण भीषण परेशानियों से जूझ रहे हैं। दैनिक जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं जैसे कि पीने का पानी, खाना बनाना और अन्य घरेलू कार्य पूरी तरह से प्रभावित हो चुके हैं और पूरा गांव जल संकट के साये में जीने को मजबूर है।
इस गंभीर स्थिति की पृष्ठभूमि में लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक उदासीनता और ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर जल वितरण व्यवस्था मुख्य रूप से जिम्मेदार है। पिछले कई महीनों से जलापूर्ति के पाइपलाइनों में पानी का दबाव लगातार घटता गया है, जिससे सरकारी नल पूरी तरह सूख चुके हैं। स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों द्वारा समय पर न तो पुरानी पाइपलाइनों की मरम्मत की गई और न ही जल स्रोतों के पुनरुद्धार के लिए कोई ठोस कदम उठाए गए, जिसके कारण आज ग्रामीण पूरी तरह से जलविहीन स्थिति में पहुंच गए हैं।
जमीनी हकीकत बेहद दर्दनाक और आर्थिक रूप से परिवारों की कमर तोड़ने वाली है। मिली जानकारी के अनुसार, ग्रामीणों को हर पांच दिन में बमुश्किल पांच मिनट के लिए भी पर्याप्त पानी नसीब नहीं हो रहा है। पानी की यह नाममात्र की आपूर्ति घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है, जिसके चलते ग्रामीणों को अपनी प्यास बुझाने के लिए मजबूरी में छह सौ रुपए खर्च करके निजी टैंकर मंगाने पड़ रहे हैं।
गांव की महिलाओं और गृहिणियों पर इस जल संकट का सबसे बड़ा और अमानवीय मानसिक एवं शारीरिक असर पड़ रहा है। पानी की एक-एक बूंद के लिए महिलाओं को रोज घंटों तक लंबी कतारों में खड़े रहना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि बुनियादी जरूरत यानी पानी के लिए इस प्रकार की भारी आर्थिक कीमत चुकाना गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट को पूरी तरह तबाह कर रहा है, जिससे उनका जीना मुहाल हो गया है।
इस जल आपातकाल का व्यापक प्रभाव पूरे क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है। अपनी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा निजी पानी के टैंकरों पर खर्च करने के कारण ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है, जिससे बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अन्य बुनियादी जरूरतें प्रभावित हो रही हैं। पानी की तलाश में घंटों बर्बाद होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
ग्रामीणों द्वारा बार-बार गुहार लगाने और स्थानीय अधिकारियों को अपनी समस्याओं से अवगत कराने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर अब तक कोई ठोस और प्रभावी कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। संबंधित विभागों के अधिकारी केवल कागजी आश्वासन दे रहे हैं, लेकिन धरातल पर न तो नियमित जलापूर्ति बहाल हो पा रही है और न ही सरकारी खर्चे पर पर्याप्त टैंकरों की व्यवस्था की जा रही है। जनता में इस लचर प्रशासनिक रवैये के प्रति भारी रोष व्याप्त है।
परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अब ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है और उन्होंने प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी दी है। यदि जल्द से जल्द इस पेयजल संकट का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया और जलापूर्ति को नियमित नहीं किया गया, तो ग्रामीण बड़े स्तर पर उग्र आंदोलन करने के लिए विवश होंगे। आगामी दिनों में प्रशासनिक कदमों और जनता के बीच के इस गतिरोध का समाधान निकालना शासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।