राजस्थान के शैक्षिक परिदृश्य में एक गंभीर प्रशासनिक और प्रबंधकीय संकट पैदा हो गया है, जिससे 53 हजार स्कूलों के बच्चों की मध्याह्न भोजन व्यवस्था पर गहरा संकट मंडराने लगा है। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को स्वच्छ और व्यवस्थित ढंग से भोजन परोसने के लिए अति आवश्यक नए बर्तन खरीदने की पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से ठप पड़ी हुई है। इस अप्रत्याशित व्यवधान ने अभिभावकों, शिक्षकों और स्थानीय समुदायों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है, जो नौनिहालों के दैनिक पोषण के लिए पूरी तरह से सरकार समर्थित योजनाओं पर निर्भर रहते हैं।
इस गंभीर स्थिति की जड़ें राज्य के शिक्षा तंत्र के भीतर जटिल नौकरशाही की देरी और नीतिगत अड़चनों में निहित हैं। पिछले कई शैक्षणिक सत्रों के दौरान हजारों प्राथमिक और उच्च प्राथमिक सरकारी संस्थानों में मौजूद पुराने बर्तनों की स्थिति काफी जर्जर हो चुकी है, जिससे कई पकाने और परोसने के सामान उपयोग के लायक नहीं बचे हैं। इस बुनियादी कमी को गंभीरता से समझते हुए विस्तृत प्रस्ताव तैयार किए गए, जिसके परिणामस्वरूप अंततः 71.90 करोड़ रुपये के भारी-भरकम वित्तीय आवंटन को इस खरीद अभियान के लिए आधिकारिक रूप से स्वीकृत किया गया।
71.90 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत होने और औपचारिक मंजूरी मिलने के बावजूद, लगातार नीतिगत मतभेदों के कारण यह महत्वपूर्ण क्रियान्वयन चरण एक ऐसी दीवार से टकरा गया है जिसे पार नहीं किया जा सका है। राज्य मुख्यालय से प्राप्त रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि शिक्षा मंत्री मदन दिलावर और प्रमुख विभागीय अधिकारियों के बीच खरीदे जाने वाले बर्तनों की सटीक विशिष्टताओं, खरीद चैनलों, वितरण रसद और गुणवत्ता नियंत्रण मानकों को लेकर आपसी सहमति का अभाव है। यद्यपि बजट के फंड अभी भी सरकारी खातों में सुरक्षित हैं, लेकिन मैदानी स्तर पर बच्चों को स्कूल के भोजन के दौरान भारी बुनियादी ढांचे की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
विद्यालय विकास समितियों, अभिभावक-शिक्षक संघों और जमीनी स्तर के शिक्षकों सहित तमाम शिक्षा हितधारकों ने इस निरंतर गतिरोध पर गहरी निराशा व्यक्त की है। शिक्षकों का कहना है कि पर्याप्त और स्वच्छ बर्तनों के बिना मध्याह्न भोजन का प्रबंधन करना भोजन सुरक्षा मानकों को कमजोर करता है और मध्यांतर के दौरान कार्यकुशलता को बाधित करता है। स्थानीय सामुदायिक नेताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि जब 71.90 करोड़ रुपये जैसे बड़े वित्तीय आवंटन सफलतापूर्वक स्वीकृत हो जाते हैं, तो शीर्ष नीति निर्माताओं के बीच प्रक्रियागत खींचतान के कारण उन मासूम स्कूली बच्चों को कभी भी सीधे तौर पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए जो पूरी तरह से राज्य द्वारा प्रदान किए गए पोषण पर निर्भर हैं।
इस राज्यव्यापी खरीद विफलता का असर कोटपूतली-बहरोड़ सहित विभिन्न क्षेत्रीय प्रशासनिक क्षेत्रों में भी गहराई से महसूस किया जा रहा है, जहां ग्रामीण और अर्ध-शहरी सरकारी स्कूल पुराने, क्षतिग्रस्त और अपर्याप्त रसोई के सामानों के साथ संघर्ष कर रहे हैं। इन जिलों के स्थानीय स्कूलों को अक्सर अस्थायी व्यवस्थाओं का सहारा लेना पड़ता है या विद्यार्थियों को घर से बर्तन लाने के लिए कहना पड़ता है, जो मिड-डे मील कार्यक्रम के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है। स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला और वे व्यापारी जो 71.90 करोड़ रुपये के बजट के तहत इन सामानों की आपूर्ति में व्यावसायिक भागीदारी की उम्मीद कर रहे थे, वे भी इस लंबी प्रशासनिक सुस्ती से काफी परेशान हैं।
बढ़ती जनसुनवाई और पत्रकारिता संबंधी पूछताछ के जवाब में प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि विभिन्न दृष्टिकोणों को पाटने के लिए आंतरिक विचार-विमर्श सक्रिय रूप से चल रहा है। मतभेदों को तेजी से सुलझाने के लिए विभाग पर नागरिक समाज संगठनों और शिक्षा परिषदों का भारी दबाव है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी प्रक्रियागत दिशानिर्देश, वित्तीय पारदर्शिता मानदंड और गुणवत्ता पैरामीटर शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के दृष्टिकोण और सरकार के प्रशासनिक ढांचे के साथ सहज रूप से मेल खाते हैं, मंत्रिस्तरीय निगरानी का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है।
भविष्य की ओर देखते हुए, शिक्षा विश्लेषक और चिंतित नागरिक 71.90 करोड़ रुपये के फंड के उपयोग को अनब्लॉक करने के लिए राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही के बीच एक तत्काल, पारदर्शी समाधान की मांग कर रहे हैं। 53 हजार स्कूलों के लिए टेंडर जारी करने और वेंडर को अंतिम रूप देने में तेजी लाना मिड-डे मील वितरण प्रक्रिया में पूर्ण सामान्य and गरिमा को बहाल करने के लिए सर्वोपरि है। जनता की उम्मीदें तत्काल मंत्रिस्तरीय हस्तक्षेप पर टिकी हुई हैं ताकि नौकरशाही की लालफीताशाही को दरकिनार किया जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चों का कल्याण सभी आंतरिक असहमतियों से ऊपर हो।