हनुमानगढ़ कलेक्ट्रेट में प्रशासनिक संवेदनशीलता और तत्परता का एक अनूठा उदाहरण देखने को मिला, जब गंभीर परेशानियों से जूझ रही एक दिव्यांग किशोरी नजमा को प्रशासन की ओर से त्वरित राहत प्रदान की गई। यह घटना तब प्रकाश में आई जब चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ इस किशोरी को उसके बुजुर्ग नाना बेहद दयनीय और संघर्षपूर्ण स्थितियों में घसीटते हुए कलेक्ट्रेट परिसर तक लेकर पहुंचे। इस दृश्य ने वहां मौजूद हर व्यक्ति का ध्यान खींचा और प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष एक गंभीर मानवीय सवाल खड़ा कर दिया।
हनुमानगढ़ कलेक्ट्रेट में जब अधिकारियों के सामने नजमा की इस विकट स्थिति और उसकी तमाम परेशानियों को रखा गया, तो प्रशासन ने इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया। सामान्यतः प्रशासनिक प्रक्रियाओं में लगने वाले समय को दरकिनार करते हुए, अधिकारियों ने स्थिति की नजाकत को समझा और बिना किसी विलंब के मौके पर ही राहत पहुंचाने के निर्देश जारी किए। इस त्वरित प्रतिक्रिया ने यह साबित कर दिया कि जब प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो जरूरतमंदों को न्याय और सहायता मिलने में देर नहीं लगती।
जमीनी हकीकत और परिवार की लाचारी को देखते हुए प्रशासन ने सबसे पहले नजमा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की दिशा में कदम उठाए। किशोरी को तुरंत एक व्हीलचेयर उपलब्ध कराई गई, जिससे उसकी आवाजाही की गंभीर समस्या का तात्कालिक समाधान हो सका। इसके साथ ही, उसकी पहचान और सरकारी योजनाओं से जुड़ने की पहली अनिवार्य शर्त यानी आधार कार्ड बनवाने की प्रक्रिया को भी मौके पर ही प्राथमिकता के आधार पर पूरा कराया गया।
प्रशासनिक अधिकारियों और सामाजिक कल्याण से जुड़े कर्मचारियों ने केवल तात्कालिक सहायता तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि नजमा के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दीर्घकालिक वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा के रास्ते भी खोल दिए। उसे नियमित पेंशन का लाभ दिलाने तथा खाद्य सुरक्षा योजनाओं के दायरे में लाने की प्रशासनिक प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से शुरू कर दिया गया है, जिससे उसके परिवार को भविष्य में दो वक्त की रोटी और आर्थिक संबल प्राप्त हो सके।
यद्यपि यह घटना विशेष रूप से हनुमानगढ़ कलेक्ट्रेट से जुड़ी है, लेकिन इसका प्रभाव और संदेश कोटपूतली-बहरोड़ सहित पूरे राज्य के प्रशासनिक तंत्र के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। इस प्रकार की घटनाएं स्थानीय स्तर पर प्रशासन और आम जनता के बीच के उस गैप को उजागर करती हैं, जिसे पाटने के लिए प्रत्येक जिले के अधिकारियों को संवेदनशीलता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है।
इस संपूर्ण प्रकरण ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली और उत्तरदायित्व को नए आयाम दिए हैं, जहां जनसुनवाई के दौरान केवल कागजी कार्रवाई करने के बजाय जमीनी और मानवीय पहलुओं को प्राथमिकता दी जाती है। इस प्रकार की त्वरित कार्रवाई से आम जनता का शासन और प्रशासन पर विश्वास और अधिक मजबूत होता है, जो कि किसी भी स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त है।
आगामी समय में प्रशासन की यह पहल नजमा और उसके परिवार के जीवन में एक स्थायी सकारात्मक बदलाव लेकर आएगी। व्हीलचेयर मिल जाने से जहां उसकी शारीरिक निर्भरता कम हुई है, वहीं आधार कार्ड, पेंशन और खाद्य सुरक्षा जैसी योजनाओं के जुड़ने से उसे सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का ठोस कवच प्राप्त हो गया है। हनुमानगढ़ प्रशासन का यह कदम अन्य प्रशासनिक इकाइयों के लिए भी एक प्रेरक मिसाल बन गया है।