दिल्ली के सफ़दरजंग इलाके में अपने घर में 35 वर्षीयर न्यायाधीश के अज्ञात कारणों से लटके हुए शरीर की खोज ने पूरे शहर को चौंका दिया है। शनिवार देर रात परिवार के सदस्य जब घर में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे तो उन्होंने जज को लटकते पाया और तुरंत पुलिस को सूचित कर दिया। स्थानीय समाचार चैनलों और राष्ट्रीय मीडिया ने इस दुखद घटना को बड़े विस्तार से उजागर किया, जिससे न्याय व्यवस्था के भीतर कार्यस्थल के तनाव और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर बहस छिड़ गई। जज का नाम और पद आधिकारिक तौर पर साझा नहीं किया गया है, परन्तु कई स्रोतों ने बताया कि वह दिल्ली उच्च न्यायालय के एक प्रमुख दायित्वों में से एक निभा रहे थे। उनके निधन की रिपोर्ट में बताया गया कि लटके रहने का कारण कोई स्पष्ट आत्मघाती इच्छा नहीं, बल्कि अचानक हुए मानसिक संकट को संकेत करता है। परिवार वालों ने कहा कि जज अत्यधिक कार्यभार और हाई-प्रोफाइल केसों की निरंतर दबाव में रहे थे, जिससे उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ सकती थी। इस बीच, पुलिस ने मौके की फोरेंसिक जांच शुरू कर दी है और आत्महत्या की पुष्टि के लिए सभी सबूतों का निरीक्षण कर रही है। यह घटना सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि न्यायिक प्रणाली के भीतर कार्यस्थल पर बढ़ते तनाव का भी संकेत है। न्यायाधीशों को उच्चस्तरीय मामलों की निरंतर दर पर सुनवाई करनी पड़ती है, जिससे उन्हें अक्सर पर्याप्त विश्राम और परामर्श की सुविधा नहीं मिल पाती। कई कानूनी विशेषज्ञों ने इस अवसर पर कहा है कि न्यायपालिका को मानसिक स्वास्थ्य सहायता कार्यक्रमों को अनिवार्य बनाना चाहिए, जिससे जजों और कोर्ट स्टाफ को पेशेवर मदद उपलब्ध हो सके। साथ ही, कार्यभार को संतुलित करने और न्यायालयों में बेहतर कार्य-जीवन संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। पुलिस की वर्तमान जांच के अनुसार, कोई बाहरी दबाव या धमकी के संकेत नहीं मिले हैं, और लटके हुए शरीर के तलाशी रिपोर्ट में कोई हिंसक संकेत नहीं पाया गया। न्यायालय ने भी इस मामले पर एक विशेष समिति गठित करने का फैसला किया है, जो जजों के भावनात्मक तथा शारीरिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करेगी। इस tragic घटना ने न्यायपालिका में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने की जरूरत को और स्पष्ट कर दिया है, जिससे भविष्य में ऐसे दुखद मामलों को रोका जा सके।