सुप्रीम कोर्ट ने कल बेंगलुरु में एक विशेष सत्र में अपनी सुनवाई के दौरान केंद्रीय एवं राज्य सरकार के कर्मचारियों को मतगणना के पर्यवेक्षक के रूप में काम करने की अनुमति देने का आदेश दिया। यह फैसला "सेंट्रल स्टाफ, गिव क्रेडेंस" के नाम से चर्चा में आया और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) द्वारा चुनाव आयोग (ईसीआई) के विरुद्ध दायर याचिका को अस्वीकार करने का परिणाम रहा। कोर्ट के इस रुख ने बहुमत में टकराव को एक दिशा दी है और अगले दिन होने वाली कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों की विधानसभा चुनावों पर गहरा असर डाला है। इस सुनवाई में टीएमसी के प्रमुख नेता मदाताबानर्जी की टीम ने तर्क दिया था कि राज्य के कर्मचारियों को मतदान गिनती के काम में लगाना चुनाव की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा करता है। उनका दावा था कि ये कर्मचारी सरकारी नियंत्रण में होते हैं और उनके द्वारा गिनती में भागीदारी के कारण पक्षपात का खतरा रहता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग ने इस दिशा-निर्देश को मौजूदा नियमों के ढांचे में बनाते हुए किसी भी प्रकार की अनियमितता नहीं पैदा की है। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी के रूप में कार्यरत लोग वैध कारणों से चुनाव प्रक्रम में शामिल हो सकते हैं और यह निर्णय उनके कामकाजी अधिकारों के उल्लंघन में नहीं आता। कोर्ट ने इस आदेश के साथ यह भी बताया कि मौजूदा नियमों में चुनाव आयोग को या तो स्वतंत्र कर्मचारी या फिर सरकारी कर्मचारी को गिनती की देख-रेख करने की अनुमति दी गई है। इस बात को ध्यान में लेते हुए न्यायालय ने कहा कि राज्य या केंद्र के कर्मचारियों को इस काम में नियुक्त करने से कार्यविभाजन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती और यह चुनाव प्रक्रिया को सहज बनाता है। कोर्ट ने यह भी समझाया कि चुनाव में भागीदारी का अधिकार और मतदान गिनती में काम करने की योग्यता दो अलग-अलग प्रश्न हैं, और यह निर्णय किसी भी राजनीतिक दल को हानि नहीं पहुंचाता। इस निर्णय के बाद कई राज्य सरकारें अपने कर्मचारियों को गिनती कार्य में शामिल करने की योजना बना रही हैं, जिससे चुनाव प्रक्रिया में तेजी और विश्वसनीयता दोनों बढ़ेगी। टीएमसी के पक्ष में यह बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि उनके विरोध के बावजूद कोर्ट ने इस मुद्दे को स्पष्ट रूप से पक्ष में लिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में चुनाव आयोग और सरकारी कर्मचारियों के बीच स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान करेगा और विभिन्न राज्य चुनावों में संभावित विवादों को कम करेगा। अंततः, यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र की मज़बूती को दर्शाता है, जहाँ न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से चुनाव से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपना साहित्यिक मूल्य प्रदर्शित करती है।