सुप्रीम कोर्ट ने इस सप्ताह एक महत्वपूर्ण फैसले में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एआईएमएस) द्वारा लड़के की गर्भावस्था समाप्ति के प्रश्न पर दायर की गई क्यूरेटिव याचिका को अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि जब किसी नाबालिग लड़की की गर्भधारण की बात आती है, तो उसका भविष्य तय करने का अधिकार केवल अस्पताल या चिकित्सकों पर नहीं, बल्कि स्वयं संबंधित बच्ची पर निर्भर होना चाहिए। इस फैसले ने गर्भपात के संबंध में भारतीय कानूनी परिदृश्य में नई दिशा प्रशस्त की और यह स्पष्ट किया कि न्यायपालिका अब व्यक्तिगत अधिकारों को सामाजिक और नैतिक दायित्वों से ऊपर रख रही है। विचाराधीन मामला एक नाबालिग लड़की से जुड़ा है, जिसे एक अप्रसव काल में गर्भवती पाया गया था। एआईएमएस ने हार्वर्ड से संबंधित चिकित्सीय जटिलताओं को देखते हुए कोर्ट से यह आदेश करने की मांग की थी कि वह गर्भपात के लिए स्वीकृति दे, बिना लड़की की सहमति के। अदालत ने इस याचिका को ठुकराते हुए कहा कि "एआईएमएस के पास लड़की के भविष्य को तय करने की शक्ति नहीं है" और यह निर्णय केवल लड़की की स्वेच्छा और उसकी उम्र के हिसाब से ही लिया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि इस दिशा में कदम नहीं बढ़ाया गया तो अस्पताल के खिलाफ निंदा के आरोप भी लगाए जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय के साथ कई महत्वपूर्ण बिंदु स्पष्ट किए। पहला, गर्भपात के मामलों में नाबालिगियों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए और उन्हें अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार दिया जाना चाहिए। दूसरा, स्वास्थ्य संस्थानों को यह समझना होगा कि उनके उपचारात्मक फैसले में रोगी की सहमति अनिवार्य है, चाहे वह शारीरिक स्थिति कितनी भी गंभीर क्यों न हो। तीसरा, न्यायपालिका ने यह भी चेतावनी दी कि यदि किसी भी संस्थान ने इस आदेश का उल्लंघन किया, तो उसे निंदा या contempt के आरोपों का सामना करना पड़ेगा। इस प्रकार, अस्पतालों और सरकार दोनों को इस दिशा में सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। इस फैसले से आगे चलकर गर्भपात संबंधी मौजूदा विधियों में संशोधन की संभावनाएं स्पष्ट हो गई हैं। कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब 20 सप्ताह की सीमा को लचीला किया जा सकता है, विशेषकर जब गर्भधारण का कारण बलात्कार या अन्य हिंसा हो। इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से अनुरोध किया है कि वह गर्भपात की अवधि को विस्तारित करने और पीड़ित महिला-नाबालिगों के लिए विशेष सुरक्षा प्रदान करने हेतु विधायी बदलाव करे। इससे न केवल सामाजिक न्याय सुनिश्चित होगा, बल्कि रोगी-केंद्रित स्वास्थ्य सेवा का भी मार्ग प्रशस्त होगा। अंत में कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय नाबालिग गर्भवती महिलाओं के अधिकारों की रक्षा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय न केवल चिकित्सा संस्थानों को उनके नैतिक दायित्वों की याद दिलाता है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी गर्भपात की प्रक्रिया को अधिक सहानुभूतिपूर्ण और मानवधिकार-आधारित बनाने की दिशा में प्रेरित करता है। भविष्य में यह आशा की जा रही है कि यह न्यायिक मार्गदर्शन मौजूदा कानूनों में संशोधन लाएगा और प्रत्येक नाबालिग लड़की को अपने शरीर के निर्णय में स्वतंत्रता प्रदान करेगा।