तमिलनाडु के 2026 विधानसभा चुनाव ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। विभिन्न प्रतिपक्षी गठबंधनों और राष्ट्रीय पार्टियों के बीच भिड़ंत के साथ, एग्ज़िट पोल ने भी कई आश्चर्यजनक संकेत दिए हैं। प्रमुख समाचार एजेंसियों के अनुसार, डेमोक्रेटिक पार्टी (DMK) के नेतृत्व में मौजूदा मुख्यमंत्री ए.वी. नवाकरन ने फिर से बड़ी बहुमत जीतने की संभावना जताई जा रही है, परन्तु इस बार कुछ अनपेक्षित मोड़ उभर रहे हैं। सबसे पहले, राष्ट्रीय स्तर पर अंधाधुंध लोकप्रियता पाने वाले अरविंद केजरीवाल की कांग्रेस और टी.आई.पी. (TMC) के साथ गठबंधन, तमिलनाडु में भी बड़ी संख्या में मतदाता वर्ग को आकर्षित कर रही है। यदि यह गठबंधन सफल हो जाता है, तो यह केजरीवाल के लिए एक बड़ा ब्रेकथ्रू साबित हो सकता है, जिससे वह राष्ट्रीय राजनीति में नया अध्याय लिख सकता है। दूसरी ओर, विख्यात रणनीतिकार प्रषंत किशोर का ‘फर्श’ मोमेंट भी सामने आया है। कई सर्वेक्षण और एग्ज़िट पोल ने दर्शाया है कि प्रषंत किशोर की सलाह पर चल रही नई गठबंधन, जिसमें बंधु दरबार, राष्ट्रवादी दल और कुछ स्थानीय पक्ष शामिल हैं, ने तमिलनाडु के प्रमुख सीटों में आश्चर्यजनक प्रगति की है। विशेषकर, कोना अटिक, चेन्नई उत्तर, और त्रिची रोड जैसे शहरी क्षेत्रों में उनके समर्थकों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि देखी गई है। यह ‘फर्श’ मोमेंट दर्शाता है कि रणनीती के स्तर पर प्रषंत किशोर ने विभिन्न सामाजिक वर्गों को जोड़े रखने की कोशिश की है, जिससे वह शक्ति के नए केंद्र को स्थापित कर सके। गौरतलब है कि तमिलनाडु का निर्वाचन निकाय 234 विधानसभा सीटों में से 98 से 120 सीटों के बीच परिणाम की भविष्यवाणी कर रहा है। एंट्री पोल के अनुसार, डेमोक्रेटिक पार्टी और उसके सहयोगी गठबंधन को लगभग 120 सीटों का भरोसा दिया गया है, जबकि प्रतिपक्षी गठबंधन को 90-100 सीटों के बीच देखा जा रहा है। विशेषकर, अंडमान-भुवनेश्वर के उत्तरी भाग और ग्रेटर चेन्नई के कुछ क्षेत्र, जहाँ ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति स्पष्ट है, वहाँ जीत की कुंजी इन दो प्रमुख क्षेत्रों में निहित है। यदि केजरीवाल की गठबंधन ने अंडमान-भुवनेश्वर भाग में वफादारी हासिल कर ली, तो वह राष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रभाव को और बढ़ा सकता है। निष्कर्षतः, तमिलनाडु 2026 के एग्ज़िट पोल ने दिखाया है कि राजनीति के मैदान में नयी संभावनाएँ और चुनौतियाँ दोनों ही मौजूद हैं। केजरीवाल का संभावित ब्रेकथ्रू और प्रषंत किशोर की रणनीति दोनों ही तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य को पुनः गढ़ने की दिशा में काम कर रही हैं। आगामी दिनों में वास्तविक मतगणना के परिणाम इस बात का पक्का सबूत देंगे कि कौन-सा परिदृश्य साकार हुआ – या तो केजरीवाल की राष्ट्रीय शक्ति में नई लहर, या फिर प्रषंत किशोर की रणनीतिक कुशाग्रता का सफल ‘फर्श’ प्रयोग। इस चुनाव ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय राजनीति में राज्यों के चुनावों का राष्ट्रीय स्तर पर गहरा असर है, और आगामी परिणाम पूरे देश की राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं।