सुप्रीम कोर्ट में सबरिमाला संदर्भ सुनवाई ने दसवें दिन तक अपनी तीव्रता को बरकरार रखा है, जहाँ 9- जज बेंच ने इस संवेदनशील मुद्दे पर कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाए हैं। इस दिन के मुख्य घटनाओं में हिंदू पारम्परिक मान्यताओं और आधुनिक संविदानिक अधिकारों के बीच की उलझन को सुलझाने की कोशिश को प्रमुखता मिली। कोर्ट में विभिन्न वकीलों और विशेषज्ञों ने अपने-अपने तर्क रखे, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि इस मामले में न केवल धार्मिक भावना बल्कि सामाजिक समरसता भी दावेदार बन गई है। कोर्ट ने पहले यह सवाल उठाया कि क्या मंदिरों को उनके आचार-व्यवहार के अनुसार स्वयं को नियंत्रित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए या फिर उन्हें संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत समान अधिकार प्रदान करना चाहिए। इस संदर्भ में चिश्ती- निज़ामी वंशज ने कहा कि "धर्मस्थलों को नियमों से शासित होना चाहिए, नहीं तो अराजकता का खतरा बना रहता है"। उन्होंने यह भी कहा कि भेदभावपूर्ण प्रावधानों को हटाने के लिए केवल संवैधानिक उपाय ही नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव भी आवश्यक है। हिंदू संगठन ने इस अवसर पर कोर्ट से 30 साल पुराने आदेश को पुनः देखने की मांग की, जिससे यह स्पष्ट हो कि उनका प्राथमिक उद्देश्य धार्मिक परम्पराओं की रक्षा करना है। इन संगठनों ने कहा कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देना धार्मिक संतुलन को बिगाड़ सकता है और सामाजिक व्यवस्था में अस्थिरता पैदा कर सकता है। जबकि वकीलों ने इस तर्क को खारिज कर दिया, यह स्थापित करते हुए कि समानता का सिद्धांत सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होना चाहिए, चाहे उनकी जाति, धर्म या लिंग कुछ भी हो। सुबह के सत्र में सुप्रीम कोर्ट ने ग़ालिब के एक शेर को उद्धृत किया — "कुच नहीं तो ख़ुदा..." — जो इस सुनवाई की गहनता और विचारों की जटिलता को दर्शाता है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि धार्मिक विश्वासों को संवैधानिक अधिकारों के साथ संतुलन में लाना आवश्यक है, न कि एक को अपमानित करके दूसरे को स्थापित करना। इस प्रकार, सुनवाई ने न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता और जजों की संवेदनशीलता को उजागर किया। अंत में कहा जा सकता है कि सबरिमाला मामले की यह सुनवाई केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक बदलाव की एक व्यापक प्रक्रिया का प्रतिबिंब है। अगले चरण में न्यायालय किस दिशा में निर्णय लेगा, यह न केवल इस विशेष मंदिर के भविष्य को निर्धारित करेगा, बल्कि पूरे देश में धार्मिक समानता और सामाजिक समरसता के मार्ग को भी संकेत देगा। इस कारण, सभी दृष्टिकोणों को सुनते हुए ये सुनवाई एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है, जहाँ से आगे का मार्ग स्पष्ट होना शुरू होगा।