अमेरिका के वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञों और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने पाकिस्तान और कतर पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि ये दोनों देश ईरान परमाणु वार्ता में 'समझौता किए हुए मध्यस्थ' की भूमिका निभा रहे हैं। फॉक्स न्यूज के सैन्य विश्लेषक और सेवानिवृत्त जनरल जैक कीन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाकिस्तानी मध्यस्थ ईरान का पक्ष लेते हुए अमेरिकी हितों की कीमत पर काम कर रहे हैं। यह आरोप ऐसे समय में सामने आया है जब पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ सीधी बातचीत के संकेत दिए हैं, जिससे पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में नया मोड़ आ सकता है। जनरल कीन के अनुसार, कतर और पाकिस्तान लंबे समय से ईरान के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए हुए हैं और इन देशों की मध्यस्थता किसी भी तरह से निष्पक्ष नहीं कही जा सकती। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका इन मध्यस्थों के माध्यम से ईरान के साथ समझौता करता है तो यह एक कमजोर सौदा साबित होगा जो तेहरान को परमाणु हथियार विकसित करने का रास्ता खोल देगा। भारत टुडे और एएनआई की रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने 'अधिकतम दबाव' की नीति फिर से लागू करने की मांग की है, जिसमें ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य विकल्प खुले रखना शामिल है। ट्रंप के हालिया बयानों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। उन्होंने कहा है कि वह ईरान के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि ईरान को परमाणु हथियार कभी नहीं बनाने दिया जाएगा। इस दोहरे रुख ने सहयोगियों और विरोधियों दोनों को असमंजस में डाल दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ अमेरिकी अधिकारी ईरान के परमाणु ठिकानों पर 'पूरी तरह हमला' करने तक की वकालत कर रहे हैं, हालांकि इससे तेल की कीमतों में भारी उछाल आने की आशंका भी जताई गई है। पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाते हुए विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया कि इस्लामाबाद ने न केवल ईरान के साथ गैस पाइपलाइन परियोजना में सहयोग किया है, बल्कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के माध्यम से बीजिंग और तेहरान के बीच रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूत किया है। कतर की बात करें तो वह हमास और तालिबान जैसे गुटों का मेजबान रहा है और ईरान के साथ उसके घनिष्ठ ऊर्जा और व्यापारिक संबंध हैं। ऐसे में इन देशों को निष्पक्ष मध्यस्थ मानना अमेरिकी हितों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। निष्कर्ष के तौर पर, पश्चिम एशिया में परमाणु प्रसार रोकने के लिए किसी भी वार्ता की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि मध्यस्थ वास्तव में कितने निष्पक्ष हैं। अमेरिकी विशेषज्ञों की चेतावनी को नजरअंदाज करना भविष्य में बड़े संकट को न्योता दे सकता है। भारत जैसे देशों के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है, क्योंकि क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी प्रयासों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। आने वाले हफ्तों में ट्रंप प्रशासन की नीति और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया इस संकट की दिशा तय करेगी।