नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा देकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। महज चार महीने पहले ही पार्टी में शामिल हुए चंद्र कुमार बोस ने निजी कारणों का हवाला देते हुए अपना त्यागपत्र पार्टी नेतृत्व को सौंप दिया है। उनके इस अचानक फैसले से राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म हो गया है, क्योंकि इससे पहले भी वे भाजपा में रह चुके हैं और तृणमूल में उनका आना एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखा गया था। चंद्र कुमार बोस ने अपने त्यागपत्र में स्पष्ट किया है कि वे व्यक्तिगत कारणों से पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे रहे हैं। हालांकि, सूत्रों की मानें तो पार्टी की आंतरिक कार्यशैली और कुछ नीतिगत मुद्दों पर मतभेद भी उनके इस फैसले के पीछे हो सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने भाजपा और तृणमूल कांग्रेस दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू बताते हुए दोनों दलों की आलोचना की है। यह बयान उनके राजनीतिक रुख में आए बदलाव को दर्शाता है, क्योंकि वे पहले भाजपा के सदस्य रह चुके हैं और नेताजी की विरासत को लेकर दोनों प्रमुख दलों के रवैये से असंतुष्ट बताए जाते हैं। तृणमूल कांग्रेस में उनका प्रवेश इसी साल बड़े जोर-शोर से हुआ था, जब पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी में शामिल कराकर एक बड़ा सियासी संदेश देने की कोशिश की थी। नेताजी के परिवार से जुड़े होने के कारण उनकी मौजूदगी तृणमूल के लिए बंगाल की अस्मिता और राष्ट्रवाद के नैरेटिव को मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा था। लेकिन इतनी जल्दी उनका मोहभंग होना पार्टी की अंदरूनी स्थिति पर भी सवाल खड़े करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम तृणमूल के लिए एक झटका है, खासकर तब जब पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि मजबूत करने में जुटी है। चंद्र कुमार बोस लंबे समय से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विरासत को संजोने और उनके गायब होने के रहस्य से पर्दा उठाने की मांग करते रहे हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग भी पुरजोर तरीके से उठाई है। उनके ताजा कदम से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि वे अब किसी नए राजनीतिक मंच की तलाश में हैं या फिर गैर-राजनीतिक मंच से नेताजी की विरासत के लिए संघर्ष जारी रखेंगे। उनके समर्थकों का मानना है कि सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले चंद्र कुमार बोस किसी भी दल की समझौतावादी राजनीति के साथ लंबे समय तक नहीं चल सकते। कुल मिलाकर, चंद्र कुमार बोस का तृणमूल कांग्रेस छोड़ना बंगाल की राजनीति में एक और अध्याय जोड़ता है। यह घटना दर्शाती है कि वैचारिक प्रतिबद्धता रखने वाले नेताओं के लिए वर्तमान दलीय राजनीति में स्पेस लगातार सिकुड़ रहा है। अब सबकी निगाहें उनके अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या वे सक्रिय राजनीति से पूरी तरह किनारा कर लेंगे या किसी नए विकल्प के साथ सामने आएंगे। फिलहाल उनके इस्तीफे ने तृणमूल कांग्रेस को असहज स्थिति में डाल दिया है और पार्टी नेतृत्व इस पर चुप्पी साधे हुए है।