दिल्ली में हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल ने गंभीर विवाद खड़ा कर दिया है। कई प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया है कि रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवानों ने दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी के निर्देश पर उन पर पैलेट गन चलाई, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। इस घटना के बाद दो पीड़ितों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है और नागरिकों के खिलाफ धातु के पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह हथियार जानलेवा है और इसके प्रयोग से आंखों की रोशनी जाने समेत स्थायी विकलांगता का खतरा रहता है। मामले से जुड़े दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि आरएएफ ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पैलेट गन का उपयोग किया था। एक आधिकारिक दस्तावेज में यह खुलासा हुआ है कि यह कार्रवाई दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के सीधे आदेश पर की गई थी। घायलों में कई ऐसे हैं जिनकी आंखों में गंभीर चोटें आई हैं और उन्हें लंबे इलाज की आवश्यकता है। इस घटना ने मानवाधिकार संगठनों और नागरिक समाज में गहरी चिंता पैदा कर दी है। पीड़ितों के वकीलों ने अदालत में दलील दी है कि भीड़ नियंत्रण के लिए इस तरह के घातक हथियारों का प्रयोग अंतरराष्ट्रीय मानकों और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। विवाद बढ़ने पर आरएएफ के प्रमुख ने स्वीकार किया है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ 'अत्यधिक बल' का प्रयोग किया गया था। इसके बाद बल ने एक आदेश जारी कर जंतर-मंतर क्षेत्र में पैलेट गन और बिजली के झटके देने वाले हथियारों के इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगा दी है। इस स्वीकारोक्ति को याचिकाकर्ताओं के दावों की पुष्टि के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह प्रतिबंध केवल एक स्थान तक सीमित है और देश के अन्य हिस्सों में, विशेषकर जम्मू-कश्मीर में, इन हथियारों का बेरोकटोक इस्तेमाल जारी है। इस घटना ने जम्मू-कश्मीर में पैलेट गन पीड़ितों के पुराने जख्मों को फिर से हरा कर दिया है। चौदह साल की उम्र में पैलेट गन से अपनी आंखों की रोशनी गंवा चुकी एक महिला ने दिल्ली की घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस हथियार ने उसकी जिंदगी तबाह कर दी थी और अब यह दिल्ली की सड़कों पर भी कहर बरपा रहा है। उसने सरकार से मांग की है कि इस अमानवीय हथियार को तुरंत प्रतिबंधित किया जाए ताकि कोई और इसकी भेंट न चढ़े। कश्मीर में सैकड़ों युवा पैलेट गन के कारण आंशिक या पूर्ण रूप से दृष्टिहीन हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर आने वाला फैसला देश में भीड़ नियंत्रण की नीतियों की दिशा तय करेगा। यह मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक स्वतंत्रता और राज्य की शक्ति के बीच संतुलन का एक बड़ा सवाल है। अगर अदालत पैलेट गन पर प्रतिबंध लगाती है, तो यह मानवाधिकारों की रक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा। तब तक, घायल प्रदर्शनकारी और उनके परिजन न्याय की आस में अदालती कार्यवाही पर नजरें टिकाए बैठे हैं।