केंद्र सरकार ने परीक्षाओं में पेपर लीक और नकल जैसी गड़बड़ियों पर अंकुश लगाने के लिए सोमवार को लोकसभा में एक सख्त विधेयक पेश किया। इस 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024' का उद्देश्य प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखना और लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले माफिया तंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकना है। विधेयक में दोषियों के लिए अधिकतम 10 वर्ष के कारावास और 50 लाख रुपये तक के भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है, जो अब तक का सबसे कड़ा कानूनी ढांचा माना जा रहा है। विधेयक की सबसे बड़ी विशेषता जांच और सुनवाई की समयसीमा तय करना है। इसके तहत पेपर लीक के मामलों की जांच दो माह के भीतर पूरी करना अनिवार्य होगा, जबकि सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन किया जाएगा ताकि न्याय में देरी न हो। साथ ही, संगठित गिरोह बनाकर परीक्षा प्रणाली को भ्रष्ट करने वालों की संपत्ति जब्त करने का अधिकार भी जांच एजेंसियों को दिया गया है। यह विधेयक केंद्र सरकार द्वारा संचालित सभी भर्ती परीक्षाओं, प्रवेश परीक्षाओं और मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों की परीक्षाओं पर लागू होगा। इस विधेयक की पृष्ठभूमि में हाल ही में हुए NEET-UG और UGC-NET जैसी प्रमुख परीक्षाओं में पेपर लीक के मामले हैं, जिनके कारण देशभर में लाखों छात्रों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया था। विपक्षी दलों ने भी सरकार पर परीक्षा तंत्र की विफलता का आरोप लगाते हुए संसद से सड़क तक दबाव बनाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लाल किले से अपने संबोधन में परीक्षा प्रणाली में सुधार और पेपर लीक माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संकल्प दोहराया था, जिसके बाद इस विधेयक को लाया गया है। हालांकि, विधेयक पेश होने के साथ ही इस पर राजनीति भी तेज हो गई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के एक बयान पर विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर पेपर लीक से जुड़े अपने निजी अनुभव का जिक्र करते हुए कहा था कि पहले इससे उन्हें तकलीफ हुई, लेकिन बाद में उन्होंने इसका लाभ उठाया। विपक्षी दलों ने इस बयान को संवेदनहीन बताते हुए मंत्री के इस्तीफे की मांग की है, वहीं सरकार ने बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया है। जानकारों का मानना है कि केवल कड़ा कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि इसका प्रभावी क्रियान्वयन, डिजिटल निगरानी तंत्र को मजबूत करना और परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय करना भी उतना ही जरूरी है। अगर यह विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित होकर कानून बन जाता है, तो यह देश की परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाली की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा। छात्रों और अभिभावकों की निगाहें अब संसदीय बहस और इसके अंतिम स्वरूप पर टिकी हैं।