तीहाड़ जेल की रसोई से जुड़ी खबर ने हाल ही में बड़ी चर्चा को जन्म दिया है। जेल में बंद अमेरिकी नागरिक और पूर्व मेरसीनरी मैथ्यू एरन वैनडिक ने अपने भोजन के बारे में अत्यधिक असंतोष व्यक्त किया और अदालत में विशेष रूप से 'अमेरिकन‑स्टाइल' भोजन की माँग की है। उनका दावा है कि जेल का खाना अत्यधिक मसालेदार, तेलीय और गहरी तली हुई चीज़ों से भरपूर है, जिससे उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। वैनडिक ने यह भी बताया कि उन्हें श्रिंप, पास्ता और चिकन जैसी बुनियादी चीज़ों की कमी महसूस हो रही है, जबकि उनकी दैनिक कैलोरी तथा पोषक तत्वों की जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं। इस मांग को लेकर जेल के अधिकारियों और मानवाधिकार संगठनों ने मिलकर एक समाधान निकालने की कोशिश शुरू कर दी है। वैनडिक का कहना है कि जेल में दी जाने वाली आम भारतीय रसोई का भोजन उनके पाचन तंत्र के अनुकूल नहीं है। उन्होंने बताया कि उन्हें बहुत जली हुई सब्जियों, बहुत अधिक तेल तथा चटनी में तीखा मसाला मिल जाता है, जिससे उनका वजन घट रहा है और शरीर पर असर पड़ रहा है। उनकी स्वास्थ्य रिपोर्ट में 14 किलोग्राम वजन घटने की बात सामने आई है, फिर भी उन्हें फास्ट‑फ़ूड विकल्प नहीं दिए जा रहे हैं। वैनडिक ने अदालत में मांग की है कि उन्हें रोज़ाना दो बार ताजा चिकन और मछली, साथ ही ऑलिव ऑयल तथा कम तेल वाली डिशेज़ दी जाएँ, जिससे उनका पोषण स्तर सुधर सके। यह केस अब भारतीय न्याय व्यवस्था में एक नई दिशा को इंगित कर रहा है, जहाँ विदेशी कैदियों के आहार संबंधी अधिकारों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जेल प्रशासन ने इस मांग को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि वह कैदियों की स्वास्थ्य स्थिति का नियमित रूप से मूल्यांकन करेगा और आवश्यकतानुसार आहार में बदलाव करेगा। लेकिन वानडिक की वकील टीम ने यह उजागर किया है कि जेल में वर्तमान में उपलब्ध भोजन पोषक तत्वों की कमी से ग्रसित है और यह अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं है। इस बीच, मानवाधिकार संगठनों ने इस मुद्दे पर नोटिस जारी किया है कि जब तक कैदी का स्वास्थ्य सुधरता नहीं, तब तक उनके अधिकारों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। यह विवाद सिर्फ एक व्यक्ति की व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि जेल में बंद विदेशी अपराधियों के आहार एवं स्वास्थ्य अधिकारों के व्यापक प्रश्न को उठाता है। भारत में जेलों की रसोई व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को लेकर इस केस ने एक नया मोड़ दिया है। यदि अदालत वैनडिक की मांग को स्वीकार करती है, तो इससे भविष्य में अन्य विदेशी कैदियों को भी समान अधिकार मिल सकते हैं, जिससे जेलों में पोषण स्तर को लेकर एक नया मानक स्थापित हो सकता है। इस मामले की आगे की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि भारतीय न्यायिक प्रणाली अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ कैसे तालमेल बिठाती है।